रविवार, मई 24, 2009

ममता,माया और जयललिता का राजनैतिक सफर

भारतीय राजनीत में ममता बनर्जी,मायावती और जयललिता किसी पहचान की मोहताज नही हैं।बिना किसी राजनैतिक क्षत्रंप के सहारे अपने बल पर राजनीत के क्षेत्र में इतिहास रचने वाले इन तीन देवियों ने बङे बङे सुरमाओ को दिन में तारे दिखा चुकी हैं।पिछले दो दशक से भारतीय राजनीत को अपने आस पास केन्द्रीत रखने वाले इन देवियों में इस वार ममता की बारी हैं जिन्होनें अपने बल पर वामपंथियों को उसी के गंढ में पटखनी दी हैं।ऐसे कयास लगाये जा रही हैं कि अगले विधानसभा चुनाव में वामपंथियों के अवैध दुर्ग पश्चिम बंगाल की किला ममता जरुर फतह कर लेगी।लेकिन ऐसा लगता हैं कि इस बार भी ममता उन्ही राजनैतिक गलतियों को फिर से दुहराह रही हैं जिसके कारण काफी लम्बी अवधी तक राजनीत की मुख्य धारा से दरकिनार रहना पङा था।यू कहे तो इन तीनों देवियों का हाल भारतीय हांकी टीम की जैसी हैं बहुत अच्छा खेलती लेकिन जब गोल करने की बारी आती हैं तो अंतिम समय में खुद गोल करने के चक्कर में या तो बोल गोलपोस्ट के उपर से चला जाता हैं या फिर विपक्षी टीम के रक्षंक खिलाङी छिनने में कामयाब हो जाते हैं।कहने का मतलव यह हैं कि जिस सोशल इंनजीनियरिंग के सहारे मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी।लेकिन एक ही वर्ष में उसकी धार कुंद हो गयी और लोकसभा के चुनाव में नुकसान उठाना पङा।राजनीत में व्यक्तिगत विद्वेश्य और अतिवादी कार्य शैली का कोई स्थान नही हैं लेकिन ये तीनों देवी इसके शिकार हैं,।जिसके कारण हर बङी जीत के बाद इन्हे फिर से शून्य से शुरु करनी पङती हैं।मायावती जिस अंदाज में उत्तरप्रदेश की गद्दी सम्भाली थी ऐसे कयास लगाये जाने लगा था कि आने वाले वर्षों में यह देश की प्रधानमंत्री बनेगी लेकिन अपनी गलती से ये भी सीख नही ली और सत्ता सम्भालते ही व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप में अपना समय जया करनी लगी परिणाम सामने हैं।मीडिया से लेकर करुणानिधी की कैम्प भी यह मान रहा था की इस बार तमिलनाडु में जयललिता की ढंका फिर बजेगी लेकिन हुआ इसके ठिक उलट इसके पीछे भी जयललिता की हठधर्मिता आङे आयी और तमिलनाडु के इतिहास के ठिक उलट परिवार वाद के सिंकजे में उलझ चुके करुणानिधि को लोगो ने अपार मतो से जीताया। ममता बन्रजी एक बार फिर काफी तामझाम के साथ सत्ता में आयी लेकिन ऐसा लग रहा हैं कि अपनी पुरानी गलती से सीख नही ली हैं। दिल्ली पहुचंते ही ममता वही पूरानी ममता दिखने लगी जिन्हे सम्भालने में वाजपेयी जी जैसे राजनेता को काफी मस्कत करनी पङी थी।रेल मंत्रालय की जिंद और पश्चिम बंगाल की सरकार को बरर्खास्त करने की मांग एक बार फिर से पूरानी ममता की याद ताजा कर दी हैं।हलाकि यह कहावत बिहार के गांव गांव में प्रचलित हैं लेकिन थोङा अभ्रश हैं लेकिन इन तीनों देवियों पर सटीक बैठती हैं कि कुत्ता को घी नही पचता हैं मतलब सत्ता इन्हे रास नही आती हैं।

1 टिप्पणी:

गिरिजेश राव ने कहा…

अरे भाई 'तूति' नहीं 'तूती' होता है. सुधार कर लें.