रविवार, नवंबर 08, 2009

किसने कहा प्रभाष जी इस दुनिया से चले गये



प्रभाष जी को पत्रकारिता के क्षेत्र का गांधी कहे तो कोई अतिशियोक्ति नही होगी ।आने वाले समय में जब भी क्रिकेट पर बात होगी, देश के शासन व्यवस्था को लेकर लिखी जायेगी या फिर भारत के आर्थिक सामाजिक और विदेश नीति पर लिखने की बात आयेगी तो एक बार लोगो के जेहन में यह अवश्य आयेगा कि प्रभाष जी इस अंदाज में लिखते या फिर प्रभाष जी इस मसले को इस तरह से सोचते।कहने का मतलब यह हैं कि प्रभाष जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में वो महल खड़ा कर दिया हैं जिसके सामने दुनिया की सबसे बड़ी इमारत भी बौंनी लग रही हैं।


मुझे लगता हैं कि इस दुनिया में मौंत ही एक मात्र सत्य हैं जिसे झुठलाया नही जा सकता। भले ही प्रभाष जी अब टीवी स्क्रीन और अखबारों में बेवाकी से लिखते हुए नही दिखे। लेकिन आने वाले सौ साल बाद भी पत्रकार कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो जाये उसके जुबान और कलम पर प्रभाष जी की झलक दिख ही जायेगी।इनकी यही कृत्ति इन्हे पत्रकारिता का गांधी होने का गुरुर प्रदान करती हैं।कौन कहता हैं कि प्रभाष जी इस दुनिया से चले गये आज भी और अभी भी हमारे बीच उसी अंदाज में धोती पहने खड़े हैं ।और चुनौती दे रहे हैं अखबार में काम करने वाले पत्रकारों को, टीवी चैनल के एंकर और रिपोर्टर को कह रहे हैं मद्दा हैं तो प्रभाष जोशी बनकर दिखाओं।

आज पटना में पत्रकारों के बीच यह चर्चा आम रही कि दैंनिक जागरण अखबार ने प्रभाष जी के बारे में एक खबड़ तक नही लिखा। शायद गुप्ता परिवार को लग रहा होगा कि हमारे नही छापने से प्रभाष जी की लोकप्रियता में बड़ी सेंधमारी हो जायेगी।इनकी नादानी पर हंसी आती हैं बाबू अखबार के पीछे के पन्ने पर पूरे खानदान का नाम प्रबंध संपादक से लेकर स्थानीय संपादक तक क्यों न छपवा लों लोग कहेगे ही कि यह कविता और संपादकीय इसके बाप की लिखी हुई नही हैं।पैंसा है अखबार की फैक्ट्री लगा सकते हो लेकिन बाजार में प्रभाष जोशी जैसा संस्कार नही बिकता हैं जो खरीद लोगे।वक्त अभी बहुत बाकी हैं पत्रकारिता के बल पर पैंसा लूटने वाले जल्द ही इस क्षेत्र से भांगते नजर आयेगे प्रभाष जोशी का भूत इन्हें पीछा छोड़ने वाला नही हैं। प्रभाष जोशी ने एक नही, सौं नही हजार नही ,लाख नही ,करोड़ो ऐसे पाठक पैंदा करके गये हैं जो इन्हे पत्रकारिता करने पर मजबूर कर देगी।खैर छोड़िये बात करते करते कहां चले गये सवाल तो प्रभाष जी के जाने का हैं।

मुझे आज भी याद हैं तारीख 9मई 2000 समस्तीपुर जिले में बाढ आयी हुई थी प्रभाष जोशी और रामबहादुर राय रोसड़ा आये थे बाढ के हलात पर लिखने के लिए और लोगो से बाढ के स्थायी समाधान पर वहस करने के लिए।स्थान था भरतदास मंदीर परिसर में तील रखने की जगह नही थी बाढ पीड़ितों के साथ साथ आसपास के लोग आये हुए थे।कार्यक्रम की शुरुआत बाढ पीड़ितों के आप बीती से हुई और अंत प्रभाष जोशी के दमदार भाषण के साथ। प्रभाष जोशी के भाषण के दौरान सभा स्थल पर मौंजूद फटेहाल और कई दिनों से तटबंध पर शरण लिए हुए ग्रामीणों में लगा जैसे दूसरा गांधी उनके बीच हो सबों के जुबान पर बस एक ही नारा था जोशी बाबा इस दर्द से मुक्ति दिलाओं।

उस वक्त मेरी नयी नयी शादी हुई थी और अपनी पत्नी को प्रभाष जोशी का भाषण सुनाने ले गया था हलाकि उसे इक्छा नही थी उसे लग रहा था कि एक पत्रकार को देख ही रहे हैं तो दूसरा कैसा हो सकता हैं।लेकिन प्रभाष जोशी की बात सून कर पत्रकारों को लेकर उसकी पूरी धारना ही बदल गयी और आज पत्रकारिता के लिए कुछ भी कर पा रहा हू तो उसमें मेरी पत्नी की भूमिका कम कर नही आंकी जा सकती हैं ।क्यों कि हर वक्त वो जोशी जी के आदर्शों को याद दिलाती रहती हैं।यह कैसा संयोग हैं जिस दिन सुबह जोशी जी के मरने की खबर मिली उसी दिन आंफिस जाने पर मुझे प्रमोशन दिये जाने की सूचना दी गयी । लेकिन पूरे घर में खामोशी छाई हुई हैं सिर्फ एक ही चर्चा हो रही हैं किस तरह प्रभाष जोशी और राम बहादुर राय खूले आकाश के नीचे मछरदानी लगा कर सोने की जिंद करते रहे यह कहते हुए कि ऐसी स्वच्छ हवा दिल्ली में मिलती कहा हैं।काफी दिनों बाद आकाश को देखने का अवसर मिला हैं इतनी तारा को कब देखा याद भी नही हैं।घर को लोग चितित थे कि ओस में सोने पर कही इन लोगो की तबियत न बिगड़ जाये ।लेकिन दो दिनों के निवास के दौरान कभी भी जोशी जी को खांसी होते नही देखा।बाद के दिनों में इन्होने अपनी नियमित कांलम में रोसड़ा की यात्रा को लिखा था।प्रभाष जी पढे लिखे के बीच ही नही गांव के किसान के बीच भी उतने ही लोक प्रिय हैं जितने उनके कांलम पढने वाले पाठकों के बीच, ऐसे में कोई इतनी जल्दी कैसे जोशी जी के इस जहां से चले जाने की बात स्वीकार कर ले।

शुक्रवार, अक्टूबर 16, 2009

दवा के साथ साथ मर्ज बढता ही जा रहा हैं


मनुष्य के अंदर अमुमन जो बुराईया होती हैं उससे अभी तक मेरा साकपा नही पड़ा हैं।जन्म से पहले पिता का साया सर से उठ गया लेकिन आज तक कभी एहसास नही हुआ कि पिता मेरे नही हैं। अपनी बहन नही हैं लेकिन आज तक बहन का प्यार नही मिला हो ऐसा कभी नही हुआ।समाज रिश्तेदार और मित्रों का इतना प्यार मिला हैं कि आज भी मैं गैरजबावदेह हुं।बचपन दादा के गोद में गुजरा जहां सुबह होते ही ऐसे लोगो से भेट होती थी जिसके तन पर वस्त्र नही रहता था किसी का भाई बैमानी कर लिया हैं तो किसी को थाने वाला तंग कर रहा हैं तो किसी को शहर का महाजन अधिक सूद मांग रहा हैं। रोजना रोते बिलखते लोगो के बीच मेंरी नींद खुलती थी औऱ दिन भर ऐसे लोगो के बीच रहता था।यहां आने वाला हर कोई दुखिया ही रहता था ।


दादी के पास पहुंचता तो कोई महिला अपने बच्चों के इलाज के लिए पैंसा लेने के लिए बैंठी रहती थी तो कोई पिया के परदेश भेजने के लिए टिकट का पैसा लेने के लिए। कई बार तो ऐसी महिलाये भी आती थी जो कई दिनों से भुखी रहती और एक दो किलो मकई या गेहू की मांग करते हुई दिन भर बैंठी रह जाती थी।मुझे लगता था लोग गरीब क्यों होते हैं पुलिस वाले और ब्लांक वाले गरीब लोगो को ही तंग क्यों करता है।एक दिन की बात हैं एक रिक्शा वाला जो अकसर मुझे घुमाता था वह पूरी तरह से खून से लथपथ भागे भागे दादा के पास आकर गिर गया।दादा जी उसका हाल जानने के बदले उसकी पिटाई शुरु कर दी मुझे लगा यह क्या हो रहा हैं मैं जोड़ जोड़ से रोने लगा और दादा जी इसे मत मारो मत मारो कहने लगा इसी बीच वह रिक्शा चालक मार खाने के दौरान ही मुझे गोद में ले लिया और कहने लगा बाबू चलिए चलिए रिक्शा पर घुमाते हैं। उसके गोद में गया तो मुझे आज भी याद हैं कि उसका मुंह इतना गंदा महक रहा था कि उसके बाद कभी भी उसके गोद में नही गया और ना ही कभी उसके रिक्शा पर बैठा।थोड़ी देर बाद पच्चीस तीस लोग आये साथ में कई महिलाये भी थी।पता चला रिक्शा वाला अपनी पत्नी को मार दिया हैं क्यो कि उसकी पत्नी शराब पीने से हमेशा रोकती रहती थी।मुझे याद हैं कि मैंने दादा से पुछा था शराब क्या होता हैं और यह कैसे बनता हैं पता चला सरकार ही बनाकर बेचती हैं ।तब से शराब के बारे में मेरा जो ख्यालात बना आज तक कायम हैं।

बचपन में मुझसे जो कोई भी पुछता क्या बनोगे मैं गर्व से कहता था नेता बनूंगा लेकिन जैसे जैसे बड़ा होते गया नेता बनने की इक्छा मरती गयी ।बाद के दिनों मैंने देखा जनता नेता से उम्मीद करता हैं कि आप हमारे लिए गलत पेरवी करे ,हमारे नजायज कार्यों का समर्थन करे हम लोगो को लूटे आप मुझे बचाये।गरीब और बेसहारा लोगो का जमीन हड़प ले विधवा के साथ अन्याय करे और उस पाप में आप भी सह भागी बने।अगर आपने ऐसा नही किया तो आपको वोट नही देगे ।जनता के इस व्यवहार को लेकर घर में चर्चाये होनी लगी थी और सामूहिक फैसला हुआ कि अब चुनाव नही लड़ना चाहिए लेकिन चुनाव आते ही लोगो का इतना दवाव पड़ा कि चाचा जी को चुनाव लड़ना ही पड़ा और दादा जी से लेकर अभी तीस वर्ष से लगातार प्रतिनिधुत्व करे रहे मेरे चाचा जी को चुनावी हार झेलनी पड़ी।

इस खेल में वैसे ही प्रपंची लोग शामिल थे जिन्हे कभी जमीन हड़पने या फिर अपराधिक मामले में जेल जाने पर मदद नही किया गया।इस हार के बाद यू कहे तो मेरी आस्था और सम्मान इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पूरी तरह समाप्त हो गयी।लेकिन बचपन से जिन समस्याओं को देखा उसके समाधान को लेकर मन कभी भी शांत नही रहा दिल्ली विश्वविधालय से पढाई पूरी करने के बाद कई खयालात आये सिविल सर्विसेज की नौकरी का प्रयास किया लेकिन सफलता नही मिली ।कपार्ट जैसी संस्थान से जुड़ने का मौंका मिला लेकिन मुझे लगा कि स्वयंसेवी संस्थान के साथ काम करने या खुद का एनजीओ खड़ा कर लोगो के लिए काम करे इसके लिए फंडिंग को लेकर जो खेल होता हैं उसमें संतोष को पहले मरना पड़ेगा।

काफी सोच विचार कर पत्रकारिता की राह थामी और दिल्ली में पत्रकारिता करने के बजाय गांव से पत्रकारिता की शुरुआत की मेरा कैरियर 1998में प्रभातखबर से शुरु हुई और प्रिंट मीडिया में हिन्दुस्तान अखवार से खत्म हुआ।इस फिल्ड में आने के बाद पता चला कि जिस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने आये हैं वह खुद इतना शोषित हैं। लेकिन महज संयोग रहा कि इसका प्रभाव कभी भी मेरे लेखनी पर नही पड़ा शोषण के खिलाफ लिखते रहे और हर दूसरे दिन नये उत्साह के साथ अभियान जारी रखा। लालू के शासन काल में कई बड़े नेता के गिरेवान पर हाथ डाला और सुरजभान जैसे माफिया की धमकी मेरे काम पर प्रभाव नही डाल सका।मेरे उपर फर्जी मुकदमें दायर किये गये लेकिन लेखनी में निष्पक्षता और वेवाकी को देखते हुए बड़े से बड़े अधिकारी ने कभी मेरे स्वाभिमान को ठेस नही पहुंचाया।

आप को जानकर यह आशर्चय होगा कि माफिया तत्वों ने जब कलम पर अंकुश नही लगा सका तो मेरी पत्नी को भी एक मामले में अभियुक्त बना दिया लेकिन जज साहब को धन्यावाद देना चाहुंगा जिन्होने न्यायपालिक के इतिहास में पहली बार अभियुक्ति को गठघड़े में बुलाने के बजाय घर पर आकर जमानत दिये और उस मामले को तुंरत खत्म कर दिया।इस तरह के कई झंझावत झेलने पड़े हैं लेकिन मेरा मानना हैं कि आप अपने लेखनी में निष्पक्ष हैं तो एक से एक भ्रष्ठ आचरण वाले अधिकारी, माफिया,नेता और अपराधी कभी भी आपके काम में बाधा नही डालेगा।जब कभी भी किसी मसले पर कलम उठाया भ्रष्ट से भ्रष्टतम अधिकारी त्वरीत कारवाई कर लोगो को समाज को और कभी कभी गांव को न्याय दिलाया हैं।अगर किसी व्यक्ति के बारे में सीधे जाकर अधिकारी को कहा कि यह व्यक्ति अपराधी नही हैं पुलिस सोचने पर मजबूर हो जाती थी।इसके साथ न्याय नही हो रहा हैं यह कहना ही काफी था कभी किसी ने इसका प्रतिकार नही किया लेकिन इस विश्वास को जनता ने ही तोड़ा और धीरे धीरे यह संर्घष कुंद पड़ने लगा।लेकिन अभी भी वह लड़ाई जारी हैं जिसका एहसास मुझे लोरी की गीत के साथ हुआ था लेकिन इस मर्ज से अब मुक्ति चाहते हैं रात में चैंन से सोना चाहता हूं।आपके पास कोई नुकसा हो तो बताये अभी तक तो स्वस्थय और रोग विहीन बिंदास हूं ।अपने में मदमस्त व्यवस्था से लड़ता रहता हूं जितने ताकत से वार करता हूं उतनी उर्जा मिलती हैं लेकिन अब थोड़ी थकान महसूस होने लगी हैं।चलिए इस पर्व के अवसर पर आपका नींद क्यो हराम करु।दिपावली और छठ की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ एक सप्ताह के लिए अपनी लेखनी को यही विराम देते हैं।आज से 26अक्टूबर तक संचार के अधिकांश संशाधनों से मुक्त होकर गांव जा रहा हूं फिर वही मेंघू बाबा,खल्टू,मधुरी वकिल भुनैया तेतर,मन्ना के पास जो कभी मुझे लोरी सुनाकर कंधे पर बैठाकर मेला घुमाते थे।वक्त गुजरेगा खेत के मेर पर धान की कटनी में और गेहू और मकई के साथ साथ ईख की रोपनी करने में। मेरे दोस्त गांव जाता हू तो पूरी तौर पर किसान का जीवन जीता हूं मजदूर और किसानों से मिलता हूं।लोगो से सुशासन पर बात करता हू सरकारी योजनाओं का हाल जानता हू और उस स्कूल का हाल जरुर जानता हूं जहां से पढकर दिल्ली पहुचा था।

रविवार, अक्टूबर 11, 2009

जहां मुर्दे की भी बोली लगायी जाती हैं


नीतीश जी आपके सुशासन का एक चेहरा देश के सामने लाने जा रहा हूं पढने के बाद आप खुद तय करेगे की लोग आप को दोबारा किस बिनाह पर चुने ।यह सवाल उनके लिए भी हैं जो बिहार में बदलाव की बात सोच रहे हैं और डंके के चोट पर बोल भी रहे हैं। कभी पटना मेडिकल कांलेज देश ही नही दुनिया में ख्याति प्राप्त था आज भी अमेरिका और इंग्लैंड के बड़े मेडिकल कांलेज में यहां से पढे डांक्टर मिल जायेगे।वाकिया दो तीन दिनों पूर्व का ही हैं मेरा आंफ था आराम से घर पर मस्ती कर रहे थे और नानभेज बनने का इंतजार कर रहा था जैसे ही कुकर खुला डाईनानिंग टेबल पर बैठ गया जमकर खाया एक तो डियूटी पर नही जाने का सकुन था दूसरा प्रिय भोजन खाये जा रहा था इस बीच कई बार मोबाईल की घंटी बची लेकिन खाने की मस्ती में घंटी की आवाज मानो कान तक पहुंच ही नही रही थी।खाना खत्म करने के बाद जैसे ही विस्तर पर आराम करने पहुंचा फिर मोबाईल की घंटी बची।मोबाईल की और देखा तो जाना पहचाना नम्बर नही था फिर भी मोबाईल उठाया टुनटुन(मेरे घर का नाम हैं)संजय मामा बोल रहे हैं आवाज पहचानी लग रही थी लेकिन समझ नही पा रहा था कि ये हैं कौन लेकिन संबोधन से समझ गया कि कोई करीबी रिस्तेदार ही होगे मैं हालचाल पुछने लगा इसी बीच इन्होने बोला दतुआर वाले मेहमान जी का ऐक्सीडेन्ट हो गया हैं सुनते ही मेरा होस उड़ गया मैने पुछा आप हैं कहा उन्होने बोला रात में ही पीएमसीएच आये हैं लेकिन कोई डांक्टर ठिक से देख नही रहा हैं कोई प्रायवेट में बेहतर डांक्टर हो तो बताओं।मैं हक्का बक्का था क्यो कि जिस शक्स के बिमार होने की बात की जा रही थी वो हमारे जीजी जी लगते थे और वे हमें गोद में खिलाये हुए थे ।मैं आनन फानन में तैयार हुआ और निकलने से पहले स्वास्थय मंत्री के पीए और पीएमसीएच के एक डाक्टर मित्र को फोन किया संयोग से डाक्टर पीएमसीएच मैं ही मौजूद थे ।जब तक मैं अस्पताल पहुचता मरीज को देखने के लिए डांक्टरों की लाईन लग गयी।भागे भागे मैं जब पीएमसीएच के आईसीयू रुम मैं पहुचा तो देखते हैं डांक्टरों की एक पूरी टीम लगी हुई हैं मेरे मित्र डांक्टर मुझे दिलासा दिला रहे हैं कोई घबड़ाने की बात नही हैं सब कुछ ठिक हो जायेगा।मरीज का हाल देख कर मैं इतना भावुक हो गया कि अंदर पाच मिनट भी नही रुक सका बाहर आकर सीसे से देखने लगा ।इसी बीच एक डांक्टर पहुचता है और 403नम्बर बेड के मरीज के बारे में आईसीयू के इनचार्ज से पुछताछ करने लगता हैं कब भर्ती हुआ क्या क्या ट्रिटमेंट हुआ हैं। सर कल रात को दस बजे हैं भर्ती हुआ हैं डां कस्यप देखे हैं ब्रेन हेमरेज लग रहा हैं पूरी फाईल दिखायों फाईल देखते ही डाक्टर गुस्से में आ गया कल रात में ही मेडिसीन के डांक्टर को देखने का कांल लिखा हुआ हैं अभी तक कोई देखा नही हैं सिस्टर आप लोग क्या रवैये अपनाये हुए हैं तुरंत डांक्टर मनीश पर कांल करो इस मरीज के बारे में स्वास्थय मंत्री पुछताछ कर रहे हैं।यह सब चुपचाप मैं देख रहा था इसी बीच डांक्टर की नजर आईसीयू के अंदर पड़ती हैं सिस्टर अंदर में कौन कौन डांक्टर हैं सर सभी 403 बेड के मरीज को ही देख रहे हैं।तेजी से वे भी अंदर चले गये थोड़ी देर बाद पोर्टेबल एक्सरे मशीन और अल्ट्रा साउड मशीन अंदर जाता हैं और फिर जांच शुरु होती हैं। मैं बाहर खड़ा होकर बेवस सब कुछ देख रहा था थोड़ी देर बाद अंदर से सभी डांक्टर बाहर आये और फिर शुरु हुआ लाईन आंफ ट्रिटमेंन्ट पर बहस। आधे घंटे में पाच हजार से अधिक की दवाये मरीज को लगा दी गयी ।इसी बीच पिछे से किसी के बुलाने की आवाज आयी पलट कर देखा तो सामने मेरी बहन खड़ी थी हलाकि दस वर्ष बाद आमना सामना हो रहा था लेकिन एक बार में ही पहचान गया। मैं अपने आपको संभाल नही पा रहा था लेकिन बहन बात बदलते हुए बोली इसे पहचानते हो गौर से पहचानने का प्रयास किया लेकिन चेहरा समझ में नही आ रहा था अरे यह बेबी हैं वही बेबी जिसके साथ बचपन में खेलते थे।25वर्ष बाद वह सामने थी एक प्रोढ महिला की तरह जिसके बारे में जब भी मैं ननिहाल जाता था जो बहन से भेंट होने पर पुछता था। मिल कर काफी खुशी हुई लेकिन वक्त ऐसा था कि खुशी व्यक्त नही हो पा रहा था।आंखो आंखो में ही एक दूसरे को अपने बचपन की यादे को ताजा करते हुए कुछ कहना चाह रहे थे तभी सिस्टर बाहर निकलती हैं संतोष जी कौन हैं नीचे के रुम में डांक्टर साहब बुला रहे हैं।भागते हुए नीचे गया अस्पताल के कई आला डाक्टर मौंजूद थे मैं अपने मित्र के सामने चुपचाप बैंठ गया तभी एक भारी भडकम आवाज में आयी जो बेहतर ट्रिटमेंन्ट होगा वह सभी किया जायेगा उपर वाले की इक्छा हुई तो ये सकुशल घर जायेगे।मैं अंदर ही अंदर काप रहा था शायद कल रात से ही ट्रिटमेंट होता तो आज यह स्थिति नही होती खैर चुपचाप डाक्टर की बात सुनता रहा।आधे घंटे तक उस रुम में बैठा रहा स्थिति देख कर आत्मा कचोट रही थी पेसेंट का परिवार दौड़ रहा हैं डांक्टर आक्सीजन का पाईस निकल गया हैं डांक्टर साहब मेरा पेसेंट तीन घंटे से दर्द से चिहार रहा हैं कोई देखने वाला नही हैं,डांक्टर साहब देखिये दिखिये मेरे पेसेंट का हालत अचानक बिगड़ गया हैं। सामने बैंठे जुनियर डांक्टर की और देखते हुए जाओं देख लो सीनियर डांक्टर इसी तरह से फरमान जारी करते रहे हर पांच मिनट पर तेज रोने की आवाज आती रहती थी।एक डांक्टर उठा कहा चलो यार यहां पर लोग शांति से बैठने भी नही देगा।यह सब मैं चुप चाप देख रहा था और सोच रहा था यही डांक्टर हैं जिसे लोग भगवान मानते हैं।सभी के सभी सीनियर डांक्टर उठ कर चल दिये। संतोष जी आप भी चलिए यहां पर बैठना मुश्किल हैं शांति से हमलोग बात भी नही कर सकते हैं।तभी एक जुनीयर डांक्टर तेजी से अंदर आता हैं सर उस पेसेंट का बीपी बहुत तेजी से फांल कर रहा हैं समझ में नही आ रहा हैं अरे यार फलाना दवा दे दो जब तक मरीज के परिजन दवा लेकर आता तब तक पेसेंट की मौंत हो गयी यह सब जाते जाते देख रहा था ।मेने अपने मित्र डांक्टर को बुला कर कहा आप लोगो की संवेदना मर चुकी हैं आप कहां रहेगे मैं उपर मरीज को देख कर आ रहा हूं उपर जब मरीज के पास गया तो लगा चमत्कार हो गया सांसे जो इतनी तेज चल रही थी लगभग समान्य हो गया था और चेहरे का रंग बदलने लगा था बीपी,पल्स रेंट और हार्टवीट पूरी तरह समान्य हो गया था बाहर निकल कर फिर डां0 को फोन किया बोले में तुरंत आ रहा हू परिवर्तन देख कर डां0 साहब भी थोड़े आसानवित हुए और बोले आज रात बच गये तो हम लोग रिकभर कर लेगे सही माईने में कहे तो अभी इनका इलाज शुरु हुआ ही हैं।लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मनजुर था जैसे ही मैं घर लौटा फोन आया एक्सपाईर कर गये।भागे भागे अस्पताल पहुंचा रात के 11 बज रहे थे होने लगा कैसे भेजा जाये गांड़ी वाले से बातचीत होने लगी मधुवनी जाने के लिए पांच हजार रुपये से कम कोई भाड़ा नही बता रहा था।तब तक मैं भी अपने को संभाल लिया था।पीएमसीएच पीरवहोर थाने मैं पड़ता हैं याद आया अड़े यहां का थानेदार पूर्व से परिचित हैं रात के बारह बजे उनके मोबाईल पर फोन किया घंटी बजते ही बोल उठे संतोष जी इतनी रात गये क्या बात हैं सारी बात बताया कहां पाच मिनट के अंदर तिवारी जी आपके पास पहुंचे रहे हैं आप वही रहे। पाच मिनट में ही थाने की मोबाईल गाड़ी आ गयी आवाज लगाते ही आपातकालीन सेवा के सामने लगाये हुए गाड़ी में से एक व्यक्ति भागे भागे तिवारी जी के पास पहुचा तिवारी जी कड़क कर बोले ऐ साहब के मित्र हैं तुरत गाड़ी दो सर तेल भरवा दिजियेगा मैं चुपचाप यह सब सुन रहा था मैंने पुछा तिवारी जी यह लुटेरो की बस्ती हैं क्या तिवारी जी बड़ी बेवाकी से कहां सर पीएमसीएच यमराज का घर हैं यहा डाक्टर से लेकर स्वीपर तक लुटेरा हैं।तभी पता चला कि लाश का पोस्टमार्टम होगा क्यों कि मामला ऐक्सीडेन्ट से जुड़ा हैं।इलाज के हड़वड़ी में मैं पुछ भी नही सका था कि कैसे घटना घटी।यह सब बाते हो रही थी कि थाना अध्यक्ष भी पहुंच गये ।वे खुद डांक्टर से बात किये और उसी समय यादव जी को फोन लगाये यादव जी सुबह सुबह आ जाईएगा पहला पोस्टमार्टन इनका होना चाहिए।उसके बाद विचार हुआ जो साथ महिलाये और बच्चा आया हैं उसके भेज दिया जाये क्यों कि पोस्टमार्टम होते होते बाहर बज ही जायेगा।बोलोरो जैसी गाड़ी से इन लोगो को भेजने का फैसला लिया गया बात होते होते सुबह के पांच बज गये थे।पीएमसीएच के सामने वाले टेक्सी ऐसटेन्ड से बात की गयी तो चार हजार से कम में कोई गाड़ी वाला जाने को तैयार नही थी हार कर पटना जग्शन के जीआरपी प्रभारी को फोन किया तुरंत एक गांड़ी 2000हजार रुपये के किराये पर भेज दिया।इन गाड़ी से सभी महिला को भेजवा कर हम भी फ्रेस होने घर आ गये।थोड़ी देर बाद अस्ताल से फोन आता हैं लाश को आईसीयू से निकाल कर मुर्दा घर में रखने के लिए एक हजार रुपया मांग रहा हैं।मैं हैरान रह गया ये क्या बात हुई तब मैंने पीएमसीएच बीट देखने वाले एक रिपोर्टर को फोन किया उसको सारी बाते बतलायी उसने वहां के कर्मचारी नेता का मोबाईल नम्बर दिया और कहा हम बात कर लते हैं।थोडी देर बाद फोन किया नेता का जवाव आता हैं सर यह पहचान नही रहा था लाश को पोस्टमार्ट के लिए भेज रहे हैं।थोडी देर बाद मैं भी अस्पताल पहुंच गया पता चला ये लोग सौ रुपया दे दिये हैं।तभी एक व्यक्ति आया और कहां सर पोस्टमार्टम वाले को आप खुद कह देगे बहुत पैंसा मांगता हैं।तय समय के अनुसार पुलिस अधिकारी बयान लेने आ गये तुरंत बयान की प्रक्रिया पूरी हो गयी मैंने जानने के उद्देश्य से कर्मचारी संघ के नेता से पुछा यह पुलिस वाला कितना लेता हैं सर जी यहां पोस्टींग करवाने के लिए एसएसपी के यहां बोली लगती हैं जैसा मामला होता हैं वैसा उसका रेट होता हैं.।खैर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचा नेता से पुछा अब क्या करना हैं उसने कहा चलिए सर अंदर आप ही बात कर ले जैसे ही अंदर गया टेबुल पर कई लाश रखी हुई थी और एक व्यक्ति बड़ा चाकू से लाश का पेट फार रहा था।कहा अईलोहन(आये) नेता जी ऐ सुनों ये पत्रकार साहब हैं पहचाने छिए बोलहो काम क्या हैं।नेता जी सारी बात बतला दिया।कहा आज वैसे ही धन्धा मंदा हैं अभी तक रोज 15से बीस लाश आ जाता था लेकिन आज तो पांच पर भी आफत हैं इसी बीच डांक्टर भी आ गये मैंने अपना पिरचय दिया और आग्रह किया कि लाश को दुर जाना हैं इसलिए थोड़ा कम चीर फार करगे।खैर पोस्टमार्टम हो गया लाश ले जाने की बारी आयी तो मौल भाव होने लगा मैं इससे अपने आप को साफ अलग रखा वह बार बार कह रहा था पत्रकार साहब वाला बात हैं इसलिए दो हजार मांग रहे हैं नही तो चार पाच हजार से कम नही लेते ।ज्यदा मोलभाव करियेगा तो लाश को बिना टांका लगाये दे देगे मैं चुपचाप बाहर यह सब सुनता रहा तभी एक पुलिस अधिकारी आ गया संतोष जी कोई बड़ी घटना घटी हैं क्या नही नही मजरा समझते ही वह धिकारी अंदर गया और कड़क कर कहा लाश को बढिया से टांका लगाकर पैंक करो अचानक सभी लोग चुप हो गये थोड़ी देर बाद देखते हैं लाश को बाहर निकाला जा रहा हैं बाद में मैंने पुछा तो पता चला कि पांच सौ रुपया दे दिये हैं।ये सारी बाते कहने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ यह दिखलाना हैं कि भ्रष्टाचार किस तरीके के कहा कहा जड़ जमाये हुए हैं ।ऐसे हलात में एक ईमानदार आदमी की ईमानदारी बच पायेगी जहां इलाज कराने से लेकर लाश ले जाने तक की किमत तय हैं।यह हालात हैं सूबे की राजधानी पटना में स्थित पीएमसीएच अस्पताल का जिस पर मुख्यमंत्री से लेकर सूबे के तमाम आलाधिकारी की नजर रहती हैं।अब आप ही बताये इस सुशासन का क्या मतलव हैं।





मंगलवार, अक्टूबर 06, 2009

तूती की आवाज के सफर का एक वर्ष

आज से एक वर्ष पूर्व तूती की आवाज के माध्यम से आप सबों से मिलने का मौंका मिला कई अच्छे अनुभव भी हुए टी0वी0स्टार रविश जी जैसे लोगो का प्यार मिला, सागर जैसा पाठक मिला जिन्होने समय समय पर बेहतर सलाह दिया।वन्दना अवस्थी जैसी महिला मित्र मिली जिन्होने महिलाओं से जुड़ी खबरो पर सार्थक सलाह समय समय पर देती रही ।कौशल जी जैसे नीतीश समर्थक भी मिले।इस तरह ब्लांग के इस सफर में कई ऐसे लोग मिले जिन्होने सफर को जारी रखने में काफी मदद की।सुधा गुप्ता, अर्शिया, अजय कुमार झा जैसे मित्र भी मिले जिन्होने समय समय पर हौंसला अफजाई किया। साथ काम करने वाले वरिष्ट प्रबोध जी का सहयोग सराहनीय रहा जिन्होने समय पर समय तकनीकी सहयोग के साथ साथ आलेख पर प्रतिक्रिया भी दिया।हमारे संस्थान के तकनीकि इनचार्ज का भी सहयोग मिला जिन्होने मेरे ब्लांग को साथ काम करने वाले लोगो के कम्पूटर से जोड़ दिया।सबो के प्यार और स्नेह से यह सफर जारी रहा हैं अब तो ऐसा लगने लगा हैं कि भोजन की तरह ब्लांग पर जाना शाररीक और मानसिक जरुरत बन गयी हैं। इसके बगैर जी नही सकते हैं जैसे सुबह सुबह अखबार देखने की बैचेनी रहती हैं उसी तरह रात में सोने से पहले ब्लांग पर जाने की बैचेनी रहती हैं।इस आदत से मेरी पत्नी काफी नराज भी रहती हैं। मेरी पहचान साथ काम करने वालो के बीच ननसिरियस लोगो की श्रेणी में आता हैं हसना और हसाना मेरी पहचान हैं कोई कभी भी गम्भीर बहस के दौड़ान मेरी प्रतिक्रिया पर ध्यान नही देते हैं लोगो को लगता हैं संतोष को बोलने की आदत हैं ।लेकिन तूती की आवाज ने मेरे कई मित्र को मेरे बारे में अलग तरह से सोचने को मजबूर किया हैं।साथ काम करने वाले ऐसे ही एक मित्र जो उर्दु चैनल के बिहार के चीफ हैं महफुज जी एक दिन अचानक मेरे पास आये और धीरे से कहा भाई हम तो आपके फैन हो गये हैं। तूती की आवाज को पढने के बाद आपके बारे में मेरा नजरिया ही बदल गया आप रोजमर्रे की घटना को जिस अंदाज में रखते हैं इसकी सानी नही हैं। इसी तरह की प्रतिक्रिया साथ कार्य करने वाले कुलभूषण जी का भी रहा।मुझे लगा कि ब्लांग बनाने का मेरा मकसद कामयाब हो गया मैंने ब्लांग के माध्यम से वैसे लोगो की लड़ाई भी जीती हैं जिसको लेकर आज का अखबार और टीवी0 चैनल खामोश हैं।दरभंगा की पिक्की जिसे लोगो ने वैश्यामंडी में बेच दिया था ब्लांग पर खबड़ आने के बाद इस तरह भूचाल मचा कि आज इसमें शामिल सभी अपराधी सलाखो के पीछे हैं।इसी तरह कि प्रतिक्रिया बेगूसराय में सरेआम थानेदार द्वारा एक रिक्शा चालक की पिटायी के मामले में सामने आया थानेदार निलम्बित हुआ और रिक्शा चालक पर दर्ज झूठा मुकदमा वापस लेना पड़ा। मैं इसी मकसद के साथ ब्लांग शुरु किया था कि वैसे अंतिम आदमी का आवाज बनकर कार्य करु जिसकी आवाज इस सोर में कही गुम हो गयी हैं।आप सबों का इसी तरह से प्यार मिलता रहा तो यह ब्लांग एक आन्दोलन बनकर बिहार के नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।

बुधवार, सितंबर 30, 2009

बिहार में नौका दुर्घटना सौ के मरने की आशंका जिम्मेवार कौन

बिहार और हादसा एक दूसरे का प्राय बन गया हैं।छतीशगढ के कोरबा में चिमनी गिरने से 31बिहारी मजदूर के मरने का गम अभी मिटा भी नही था कि ,दशहरे की शाम खगड़िया और दरभंगा जिले में हुए नौंका दुर्घटना में सौं से अधिक लोगो के मरने की आशंका हैं।शवों के निकालने का काम अभी भी जारी हैं।घटना दलित नेता रामविलास पासवान के गांव और ननिहाल में घटा हैं जहां से इन्होने अपने राजनैतिक जीवन कि शुरुआत की और आज भी इन क्षेत्रों का प्रतिनिधुत्व उनके अपने रिश्तेदार ही कर रहे हैं। रामविलास पासवान अपनी सभा में हमेशा यह जुमला दोहराते रहे हैं कि मैं उस घर में दिया जलाउँगा जिस घर में सदियों से अंधेरा हैं ।लेकिन इस नारे में कितना दम हैं वह इस हादसे से समझा जा सकता हैं।मरने वालों में अधिकांश रामविलास पासवान के गांव शहरबन्नी का रहने वाले हैं।यह गांव खगड़िया जिले के अलौली प्रंखड में पड़ता हैं जहां आज भी जाने के लिए सड़के नही हैं खगड़िया आने के लिए नाव से नदी पार करनी पड़ती हैं।रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपतिपारस पिछले 25वर्षों से लगातार इस क्षेत्र से चुनाव जितते रहे हैं लेकिन अपने गांव जाने के लिए एक पुल तक नही बनवा पाये । आम राय यह हैं कि बड़े घर में पैदा लेने वाले ऐसे लोग जो गांव की पगडंडी नही देखी हैं वे देश का कैसे प्रतिनिधुत्व करेगे।आप ही बताये रामविलास पासवान बिहार के सबसे पिछड़े इलाकों में जन्म लिय़े हैं वही पले बढे उसी गांव में पढाई की ।खेतो के मेर पर चल कर दिल्ली पहुंचे और फिर भूल गये अपने ही गांव को। जिस बागमति नदी के घाट पर घटना घटी हैं उस नदी को हजारो बार पार किये होगे रामविलास पासवान, नदी पार करने के दर्द को हजारो बार महसूस किये होगे लेकिन उस दर्द को मिटाने के लिए कोई पहल नही किया।क्या दर्द महसूस करने वाला ही गरीबों का भाग्यविधाता हो सकता हैं इस घटना ने वर्षों पुरानी इस मिथिया को तोड़ दिया हैं जिसको लेकर हमारे दिल्ली में बैठे मित्र आये दिन बड़े बड़े आर्टकिल लिखते रहते हैं। हादसे का यह एक पहलु हैं दूसरा पहलु भी कम गम्भीर नही हैं पर्व का मौंसम आते ही उसके तैयारी को लेकर पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री स्तर तक बैंठके होती हैं।एक से एक फरवान जारी की जाती हैं लेकिन उसके प्रति पदाधिकारी कितने गम्भीर रहते हैं उसका एक यह जीवंत नमूना हैं।उत्तरी बिहार में करीब सौ से दो सौ ऐसी घाट हैं जहां से रोजना लोग नांव से पार करते हैं ।इसके बदले में गांव वाले को पैसा भी देना पड़ता हैं ।सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ो रुपये इसके ठिके से आता हैं लेकिन इसके रख रखाव पर सरकार कुछ भी ध्यान नही देती हैं।जिसके कारण आये दिन नौंका दुर्धटनाये होती रहती हैं और सरकार लाख रुपये मुआवजा की घोषणा कर अपने जबावदेही से मुक्त हो जाती हैं।मेरा खुद का अनुभव हैं जब में दरभंगा में पदस्थापित था शुक्रवार का दिन था करेह नदी पर स्थित हथौंड़ी घाट पर पहुचे तो हैरान रह गया जिस घाट पर पांच से दस आदमी नाव से पार करते थे आज दौ सौ आदमी पार कर रहा हैं और हजारों लोग लाईन में लगे हैं।,नाव के किनारे पहुचते ही लोग नाव पर चढने के लिए टूट पड़ते थे।हलात यह था कि किसी भी समय नाव पानी में पलटी मार देता नाविक और घाट के ठिकेदार हल्ला कर रहा हैं लेकिन कोई मामने वाला नही था।हमारे लिए यह एक बड़ी खबड़ थी।खबड़ करने के बाद जब लोगो का बाईट लेने लगा तो पता चला कि हथौंड़ी बजार में हर शुक्रवार को हाट लगता हैं और आसपास के गांव के लोग समान खरीदने जाते हैं।अंधेरा होने से पहले गांव लौंट जाय इस हरबरी में खासकर महिलाये जान जोखिम में डालकर नदी पार करना चाहती हैं जिस दौरान कई बार हादसा भी हुआ।खबड़ पर डीएम का जब बाईट लेने पहुंचा तो पहले उनको पूरा भिजुउल दिखा दिया ।किस तरह लोक जान हथेली पर लेकर नदी पार कर रहे थे।डीएम ने बाईट देने के साथ साथ शुक्रवार को पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की नियुक्ति के साथ साथ ठिकेदार को शुक्रवार को अधिक नाव रखने का निर्देश दिया।कल की घटना के बाद जब मैं हथौंड़ी घाट के ठिकेदार के मोबाईल पर फोनकर हालचाल जानने के बाद शुक्रवार वाली व्यवस्था के बारे में पुछा तो पता चला कि सर उस डीएम साहब के जाने के बाद पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की तैनाती बंद ही हो गयी और आप भी इधर नही आ रहे हैं जो ये बाते बताते।कहने का मेरा मकसद यह हैं कि सभी अधिकारी जानते हैं कि हाट के दिन और पर्व त्यौहार के दिन गांव की महिलाये सजधज कर पास के छोटे शहरो में अपने बच्चों के साथ मेला देखने जाती हैं जिसमें शतप्रतिशत महिलाये निरक्षर होती हैं और कई तो पहली बार बाजार देखती हें।पूरे दिन शहर आती हैं और शाम होते ही गांव जाने की जल्दी में किसी भी तरह जान जोखिम में डालकर नदी पार करना चाहती हैं ।जिसके कारण बिहार में प्रति वर्ष नौका दुर्घटनाये होती हैं और इसमें सैकड़ो लोगो की जाने भी जाती हैं।लेकिन प्रशासन आज तक इस घटना से सीख नही ली हैं।क्या ऐसे प्रशासक को जनता के गाढी कमाई से वेतन पाने का हक हैं क्यों न इन्हे बर्खास्त कर दिया जाता हैं इस मौंत के लिए आखिर कौन जिम्मेवार हैं जब तक जिम्मेवारी तय नही की जायेगी यह सिलसिला जारी रहेगा।

रविवार, सितंबर 27, 2009

जुल्म सहने से बेहतर हैं पति के बगैर जीने की आदत डालों

मैंच भारत और पाकिस्तान के बीच हो और रोमांस न हो ऐसा हो नही सकता हैं।सुबह से ही मैंच को लेकर बेचैनी थी। लेकिन दिन की शुरुआत कुछ अच्छा नही रहा 21वी संदी में भी लड़किया कितनी विवश और लाचार हैं उसका एहसास पहली बार मुझे हो रहा था ।अब तक तो एक पत्रकार के रुप में लड़कियों के मसले को देखते और दिखाते रहे थे ।लेकिन आज मुझे एहसास हुआ कि लड़किया इतनी विवश क्यो हैं।मैं वह सब कुछ देखता रहा जिसको लेकर मैं कभी टीवी एसक्रिन पर आग उगला था ,मैं वह सब कुछ देखता रहा जिसको लेकर मैने पूरी सिरीज लिख डाली थी लेकिन आज मेरा कैमरा और कलम दोनों खामोंश हैं।चीख चीख कर स्वाती बोल रही थी जीजा जी मुझे रोक लो नही तो मेरी लाश देखोगे। लेकिन मैं विवश स्वाती को उस जुल्मी के साथ जाने देने को विवश था जिस को मैं कल तक अपना सबसे अजीज मानता था। भारत की बैंटींग शुरु हो गयी थी और अपने युवा बिग्रेड का खेल देख कर आने वाले बेहतर कल की उम्मीद में स्वाती के बारे में ही सोचे जा रहा था।मोबाईल की घंटी बचते ही चौंक उठता था कही कोई अशुभ समाचार तो नही हैं।खैर भारतीय टीम के युवा बिग्रेड का खेल देख कर बड़ा सकून हुआ और विस्तर पर आते ही नींद भी आ गयी ।कल उपवास खत्म होने वाला था उसकी भी बैंचनी थी फिर भी आराम से सोया हुआ था कि अचानक छोटे छोटे बच्चियों के किलकारी की आवाज सुनायी दी।आंख खुली तो सामने के छत पर खुबसुरत पंडाल के बीच छोटी छोटी लड़किया बैठी हुई थी।अचानक याद आया अरे आज तो कुमारी पूजा हैं ।विस्तर पर लेटे लेटे ही देखने लगे महिलाये लड़कियों को सजा रही थी फिर बारी बारी से पैर छू कर आशीर्वाद ले रही थी। एक लड़की पर मेरी नजर पड़ी पूरी तरह से खामोश चुप चाप पूरी गतिविधि को देख रही थी अचानक वह उठकर चल दी महिलाये दोड़ी बैंठ जाओं बैंठ जाओं लेकिन किसी की एक नही सूनी सामने स्थिति नल पर चली गयी और पानी चलाकर रंगे हुए पैंर को धोने लगी उसके चेहरे को देखने से लग रहा था कि उसके साथ जो व्यवहार किया जा रहा था वह उसे पसंद नही था।उसके इस विरोधी तेवर को देख मैं विस्तर से उठ बालकोनी की तरफ भागा जब तक मैं पहुचता वह नीचे उतर चुकी थी और महिलाये आपस में फुदफुदा रही थी।काश यह विद्रोही तेवर स्वाती की होती तो आज उसे जलालत की जिंदगी जीना नही पड़ता।उसका एक ही जवाव मेरे दिलो दिमाग को झकझोड़ रहा था जीजा जी जिस दिन लड़की में पैदा लिया पिता का घर बेगाना हो गया जब से होश सम्भाला बुआ, दादी मां,चाची बस इतना ही कहती थी दूसरे घर की अमानत हैं ऐसा मत कर ऐसा क्यों करती हो।जीजा जी सत्या को कैसे छोड़ दे बाहर की दुनिया में जीना तो और भी मुश्किल हैं,ताना सुनते सुनते मैं मर जाउगी। आज पति चरित्र पर सवाल खड़ा कर रहा हैं कल सारी दुनिया मेरे चरित्र को तार तार करने में लग जायेगी। यह हकीकत हैं मंदी के इस दौड़ में परेशान निराश एक युवा कप्ल का जिसकी शादी को हुए आठ माह भी नही हुआ हैं।स्वाती की शादी एलजी0में काम करने वाले एक योग्य इंनजीनयर से हुआ सपनों की बड़ी बड़ी उड़ाने लेकर अपनी ससुराल आयी ।लेकिन स्वाती सपनो में भी यह नही सोची थी कि उसके साथ यह सब होगा।हनीमून मनाने शिमला गयी एक पखवाड़े बाद जब लौटकर आयी तो अचानक बिमार हो गयी डांक्टर पर डांक्टर बदलते रहा लेकिन बुखार कमने का नाम नही ले रहा था।यह देखकर महिलाये भूत प्रेत की चर्चाये करनी लगी और होते होते बात डायन पर आ गयी। इस बीच स्वाती का जन्म पत्री देखाया गया तो वह मंगली निकली इसके बाद तो उसके उपड़ दुख का पहाड़ ही टुट परी सास का ताना शुरु हुआ और देखते देखते पूरे घर की वह भिलेन बन गयी फिर भी पति का साथ मिलता रहा इस बीच कम्पनी के उतार चढाउ को देखते हुए उसे कम्पनी बदलनी पड़ी और नये कम्पनी में आते ही मंदी का मार पड़ने लगा।चार माह में तीन कम्पनी बदलनी पड़ी और इसके कारण शहर भी बदलता रहा। नौकरी के उठापठक और नये दौड़ के युवाओं में रातो रात करोड़पति बनने और बीबी के साथ फाईव स्टार होटल में रात गुजारने और बीबी हो तो ऐश्वारिया राय की तरह।इस सनक के कारण आज देश का लाखों युवक डिप्रेशन का शिकार हैं।उदारीकरण के दौड़ में रातो रातो इतनी कमाई बढ गयी कि उसका पैर जमीन पर नही रहा और पैसे के दंभ पर वो सब कुछ पाने का ख्वाब देखने लगा जिसके वह काबिल नही था।उसी सनक की शिकार स्वाती बनी हैं आफिस के टेशन के साथ साथ अपने अयोग्यता का ठिकरा स्वाती पर मढने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह यहां तक पहुंच गया कि उसे रात रात भर पिटायी की जाने लगी। सबसे दुखद पहलु यह हैं कि इस मसले पर ससुराल के लोग चुप्पी साधे हुए हैं।स्वाती के लिए आज हर रात एक खोफनाक रात के समान हैं रोज उसे नये नये तरीके से प्रताड़ित किया जा रहा हैं। लेकिन वह सब कुछ सह रही हैं बस इस उम्मीद से की एक दिन ऐसा आयेगा कि उसका सत्या पहले जैसा प्यार करेगा।पता नही कब वह दिन आयेगा लेकिन मैं तो दोराहे पर खड़ा हुं एक तरफ मेरे ससुराल वाले हैं तो दूसरी और मेरी पत्रकारिता मैंने तय किया हैं कि अगर कोई घटना घटती हैं तो मेरी लड़ाई स्वाती को न्याय दिलाने के पंक्ष में रहेगी।शायद मेरे इस व्यवहार से लोग चेते और जेल जाने का डर भी रहे।लेकिन इस मसले का दूसरा पंक्ष यह भी हैं कि लड़की के पंक्ष में उसका बाप भी नही हैं।वो भी अपनी बेटी को यही नसीहत दे रहे हैं कि किसी तरह स्थिति को संभालो। पता नही स्वाती किस हाल में हैं लेकिन मेरा एक सवाल आप सबों से हैं और दुनिया बनाने वाले से भी हैं कि लड़की में जन्म लेना क्या वाकई अभिशाप हैं।यह मेरी लड़ाई हैं नही हैं इस जहां की लड़ाई हैं आपके आसपास रोजना इस तरह के वारदात होते रहते हैं लेकिन हम सब लड़कियों पर आरोप मंढ कर उस पर जुल्म करते हैं य़ा फिर जुल्म होते देखते रहते हैं ।

गुरुवार, सितंबर 24, 2009

नीतीश जी यह कैसा सुशासन हैं।

दुहाई हो नीतीश जी आपके सुशासन में यह क्या हो रहा हैं,पुलिस सरेआम आमलोगो की पिटाई करता हैं और आपकी सरकार उस अधिकारी को बचाने में लगा हैं।मामला बेगूसराय में एक निरीह साईकिल सवार का हैं जिसे पुलिस ने सरेआम पिटाई की हैं।शुक्र हैं ब्लांग पर खबड़ आने के बाद दिल्ली के एक बड़े पत्रकार द्वारा पुलिस मुख्यालय से पुछताछ करने के बाद दामन बचाने के लिए आनन फानन में कारवाई की गयी। बेगूसराय के नगर थानेदार विश्वरंजन को लाईन हाजिर कर दिया गया हैं।सरेआम एक निर्दोष को आमानवीय तरीके से पीट रहा हैं उससे भी मन नही भरता हैं तो पुलिस अपने बूट से सिर को तब तक कुचलता हैं जब तक वह लहुलहान नही हो जाये ऐसे मामले में महज थानेदार को लाईन हाजिर करना कहा का इंसाफ हैं।क्या नीतीश के शासन में न्याय की यही परिभाषा हैं। पूरे मामले का यह एक पंक्ष हैं दूसरा पंक्ष तो और भी घिनौंना हैं शायद आज जेनरल डायर भी रहता तो इस कृत्य को देख कर नौकरी छोड़ देता।जब पुलिस मुख्यालय ने मामले को लेकर बेगूसराय एसपी0 से पुछताछ करनी शुरु की और तय हो गया कि कारवाई होगी। तो आनन फानन में उस साईकिल वाले की खोज शुरु हुई पता चला वह व्यक्ति लक्ष्मण साह बस स्टेंट में रिक्शा चला रहा हैं। इतनी पिटाई के बावजूद दो वक्त की रोटी के लिए लक्ष्मण सुबह से ही रिक्शा चला रहा था।सूचना मिलते ही नगर थाने की पूरी फोर्स बस स्टेट को घेर लिया चारो और पुलिस को देख कर लक्ष्मण बस के नीचे छुप गया इस डर से की आज पुलिस किसकी पिटाई करने आया हैं।काफी खोजबीन के बाद भी लक्ष्मण जब नही मिला तो पुलिस वाले उसके रिक्शे को तोड़ने लगा यह देख लक्ष्मण को रहा नही गया और बस के नीचे से बाहर निकल कर चिल्लाने लगा। देखते देखते पुलिस उसे उठाकर गाड़ी में बैंठा लिया और सीधे नगर थाना पहुचा ।जहां पहले से एफआईआर का मजबून तैयार था बस नाम और पता भरना बाकी था।पहुचते ही सारी प्रक्रिया आनन फानन में पूरी की गयी और लक्ष्मण को पुलिस पर जानलेवा हमला करने के आरोप में जेल भेज दिया गया।घायल में वे सभी पुलिस वाले का नाम दर्ज हैं जो बूट से लक्ष्मण की बेहरमी से पिटाई किया था।यह सारा खेल जिला मुख्यालय में खेला गया जहां डीएम0,एसपी0और जिला जज बैठते हैं।लक्ष्मन की लड़ाई में आपका सहयोग अपेक्षित हैं ।