महात्मा गांधी हत्या केस-37
10 घंटे पहले
क्यूंकि दुनिया नक्कारखाने में तब्दील हो चुकी है . . .
बिहार और हादसा एक दूसरे का प्राय बन गया हैं।छतीशगढ के कोरबा में चिमनी गिरने से 31बिहारी मजदूर के मरने का गम अभी मिटा भी नही था कि ,दशहरे की शाम खगड़िया और दरभंगा जिले में हुए नौंका दुर्घटना में सौं से अधिक लोगो के मरने की आशंका हैं।शवों के निकालने का काम अभी भी जारी हैं।घटना दलित नेता रामविलास पासवान के गांव और ननिहाल में घटा हैं जहां से इन्होने अपने राजनैतिक जीवन कि शुरुआत की और आज भी इन क्षेत्रों का प्रतिनिधुत्व उनके अपने रिश्तेदार ही कर रहे हैं।
रामविलास पासवान अपनी सभा में हमेशा यह जुमला दोहराते रहे हैं कि मैं उस घर में दिया जलाउँगा जिस घर में सदियों से अंधेरा हैं ।लेकिन इस नारे में कितना दम हैं वह इस हादसे से समझा जा सकता हैं।मरने वालों में अधिकांश रामविलास पासवान के गांव शहरबन्नी का रहने वाले हैं।यह गांव खगड़िया जिले के अलौली प्रंखड में पड़ता हैं जहां आज भी जाने के लिए सड़के नही हैं खगड़िया आने के लिए नाव से नदी पार करनी पड़ती हैं।रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपतिपारस पिछले 25वर्षों से लगातार इस क्षेत्र से चुनाव जितते रहे हैं लेकिन अपने गांव जाने के लिए एक पुल तक नही बनवा पाये ।
आम राय यह हैं कि बड़े घर में पैदा लेने वाले ऐसे लोग जो गांव की पगडंडी नही देखी हैं वे देश का कैसे प्रतिनिधुत्व करेगे।आप ही बताये रामविलास पासवान बिहार के सबसे पिछड़े इलाकों में जन्म लिय़े हैं वही पले बढे उसी गांव में पढाई की ।खेतो के मेर पर चल कर दिल्ली पहुंचे और फिर भूल गये अपने ही गांव को। जिस बागमति नदी के घाट पर घटना घटी हैं उस नदी को हजारो बार पार किये होगे रामविलास पासवान, नदी पार करने के दर्द को हजारो बार महसूस किये होगे लेकिन उस दर्द को मिटाने के लिए कोई पहल नही किया।क्या दर्द महसूस करने वाला ही गरीबों का भाग्यविधाता हो सकता हैं इस घटना ने वर्षों पुरानी इस मिथिया को तोड़ दिया हैं जिसको लेकर हमारे दिल्ली में बैठे मित्र आये दिन बड़े बड़े आर्टकिल लिखते रहते हैं।
हादसे का यह एक पहलु हैं दूसरा पहलु भी कम गम्भीर नही हैं पर्व का मौंसम आते ही उसके तैयारी को लेकर पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री स्तर तक बैंठके होती हैं।एक से एक फरवान जारी की जाती हैं लेकिन उसके प्रति पदाधिकारी कितने गम्भीर रहते हैं उसका एक यह जीवंत नमूना हैं।उत्तरी बिहार में करीब सौ से दो सौ ऐसी घाट हैं जहां से रोजना लोग नांव से पार करते हैं ।इसके बदले में गांव वाले को पैसा भी देना पड़ता हैं ।सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ो रुपये इसके ठिके से आता हैं लेकिन इसके रख रखाव पर सरकार कुछ भी ध्यान नही देती हैं।जिसके कारण आये दिन नौंका दुर्धटनाये होती रहती हैं और सरकार लाख रुपये मुआवजा की घोषणा कर अपने जबावदेही से मुक्त हो जाती हैं।मेरा खुद का अनुभव हैं जब में दरभंगा में पदस्थापित था शुक्रवार का दिन था करेह नदी पर स्थित हथौंड़ी घाट पर पहुचे तो हैरान रह गया जिस घाट पर पांच से दस आदमी नाव से पार करते थे आज दौ सौ आदमी पार कर रहा हैं और हजारों लोग लाईन में लगे हैं।,नाव के किनारे पहुचते ही लोग नाव पर चढने के लिए टूट पड़ते थे।हलात यह था कि किसी भी समय नाव पानी में पलटी मार देता नाविक और घाट के ठिकेदार हल्ला कर रहा हैं लेकिन कोई मामने वाला नही था।हमारे लिए यह एक बड़ी खबड़ थी।खबड़ करने के बाद जब लोगो का बाईट लेने लगा तो पता चला कि हथौंड़ी बजार में हर शुक्रवार को हाट लगता हैं और आसपास के गांव के लोग समान खरीदने जाते हैं।अंधेरा होने से पहले गांव लौंट जाय इस हरबरी में खासकर महिलाये जान जोखिम में डालकर नदी पार करना चाहती हैं जिस दौरान कई बार हादसा भी हुआ।खबड़ पर डीएम का जब बाईट लेने पहुंचा तो पहले उनको पूरा भिजुउल दिखा दिया ।किस तरह लोक जान हथेली पर लेकर नदी पार कर रहे थे।डीएम ने बाईट देने के साथ साथ शुक्रवार को पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की नियुक्ति के साथ साथ ठिकेदार को शुक्रवार को अधिक नाव रखने का निर्देश दिया।कल की घटना के बाद जब मैं हथौंड़ी घाट के ठिकेदार के मोबाईल पर फोनकर हालचाल जानने के बाद शुक्रवार वाली व्यवस्था के बारे में पुछा तो पता चला कि सर उस डीएम साहब के जाने के बाद पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की तैनाती बंद ही हो गयी और आप भी इधर नही आ रहे हैं जो ये बाते बताते।कहने का मेरा मकसद यह हैं कि सभी अधिकारी जानते हैं कि हाट के दिन और पर्व त्यौहार के दिन गांव की महिलाये सजधज कर पास के छोटे शहरो में अपने बच्चों के साथ मेला देखने जाती हैं जिसमें शतप्रतिशत महिलाये निरक्षर होती हैं और कई तो पहली बार बाजार देखती हें।पूरे दिन शहर आती हैं और शाम होते ही गांव जाने की जल्दी में किसी भी तरह जान जोखिम में डालकर नदी पार करना चाहती हैं ।जिसके कारण बिहार में प्रति वर्ष नौका दुर्घटनाये होती हैं और इसमें सैकड़ो लोगो की जाने भी जाती हैं।लेकिन प्रशासन आज तक इस घटना से सीख नही ली हैं।क्या ऐसे प्रशासक को जनता के गाढी कमाई से वेतन पाने का हक हैं क्यों न इन्हे बर्खास्त कर दिया जाता हैं इस मौंत के लिए आखिर कौन जिम्मेवार हैं जब तक जिम्मेवारी तय नही की जायेगी यह सिलसिला जारी रहेगा।
मैंच भारत और पाकिस्तान के बीच हो और रोमांस न हो ऐसा हो नही सकता हैं।सुबह से ही मैंच को लेकर बेचैनी थी। लेकिन दिन की शुरुआत कुछ अच्छा नही रहा 21वी संदी में भी लड़किया कितनी विवश और लाचार हैं उसका एहसास पहली बार मुझे हो रहा था ।अब तक तो एक पत्रकार के रुप में लड़कियों के मसले को देखते और दिखाते रहे थे ।लेकिन आज मुझे एहसास हुआ कि लड़किया इतनी विवश क्यो हैं।मैं वह सब कुछ देखता रहा जिसको लेकर मैं कभी टीवी एसक्रिन पर आग उगला था ,मैं वह सब कुछ देखता रहा जिसको लेकर मैने पूरी सिरीज लिख डाली थी लेकिन आज मेरा कैमरा और कलम दोनों खामोंश हैं।चीख चीख कर स्वाती बोल रही थी जीजा जी मुझे रोक लो नही तो मेरी लाश देखोगे। लेकिन मैं विवश स्वाती को उस जुल्मी के साथ जाने देने को विवश था जिस को मैं कल तक अपना सबसे अजीज मानता था। भारत की बैंटींग शुरु हो गयी थी और अपने युवा बिग्रेड का खेल देख कर आने वाले बेहतर कल की उम्मीद में स्वाती के बारे में ही सोचे जा रहा था।मोबाईल की घंटी बचते ही चौंक उठता था कही कोई अशुभ समाचार तो नही हैं।खैर भारतीय टीम के युवा बिग्रेड का खेल देख कर बड़ा सकून हुआ और विस्तर पर आते ही नींद भी आ गयी ।कल उपवास खत्म होने वाला था उसकी भी बैंचनी थी फिर भी आराम से सोया हुआ था कि अचानक छोटे छोटे बच्चियों के किलकारी की आवाज सुनायी दी।आंख खुली तो सामने के छत पर खुबसुरत पंडाल के बीच छोटी छोटी लड़किया बैठी हुई थी।अचानक याद आया अरे आज तो कुमारी पूजा हैं ।विस्तर पर लेटे लेटे ही देखने लगे महिलाये लड़कियों को सजा रही थी फिर बारी बारी से पैर छू कर आशीर्वाद ले रही थी। एक लड़की पर मेरी नजर पड़ी पूरी तरह से खामोश चुप चाप पूरी गतिविधि को देख रही थी अचानक वह उठकर चल दी महिलाये दोड़ी बैंठ जाओं बैंठ जाओं लेकिन किसी की एक नही सूनी सामने स्थिति नल पर चली गयी और पानी चलाकर रंगे हुए पैंर को धोने लगी उसके चेहरे को देखने से लग रहा था कि उसके साथ जो व्यवहार किया जा रहा था वह उसे पसंद नही था।उसके इस विरोधी तेवर को देख मैं विस्तर से उठ बालकोनी की तरफ भागा जब तक मैं पहुचता वह नीचे उतर चुकी थी और महिलाये आपस में फुदफुदा रही थी।काश यह विद्रोही तेवर स्वाती की होती तो आज उसे जलालत की जिंदगी जीना नही पड़ता।उसका एक ही जवाव मेरे दिलो दिमाग को झकझोड़ रहा था जीजा जी जिस दिन लड़की में पैदा लिया पिता का घर बेगाना हो गया जब से होश सम्भाला बुआ, दादी मां,चाची बस इतना ही कहती थी दूसरे घर की अमानत हैं ऐसा मत कर ऐसा क्यों करती हो।जीजा जी सत्या को कैसे छोड़ दे बाहर की दुनिया में जीना तो और भी मुश्किल हैं,ताना सुनते सुनते मैं मर जाउगी। आज पति चरित्र पर सवाल खड़ा कर रहा हैं कल सारी दुनिया मेरे चरित्र को तार तार करने में लग जायेगी।
यह हकीकत हैं मंदी के इस दौड़ में परेशान निराश एक युवा कप्ल का जिसकी शादी को हुए आठ माह भी नही हुआ हैं।स्वाती की शादी एलजी0में काम करने वाले एक योग्य इंनजीनयर से हुआ सपनों की बड़ी बड़ी उड़ाने लेकर अपनी ससुराल आयी ।लेकिन स्वाती सपनो में भी यह नही सोची थी कि उसके साथ यह सब होगा।हनीमून मनाने शिमला गयी एक पखवाड़े बाद जब लौटकर आयी तो अचानक बिमार हो गयी डांक्टर पर डांक्टर बदलते रहा लेकिन बुखार कमने का नाम नही ले रहा था।यह देखकर महिलाये भूत प्रेत की चर्चाये करनी लगी और होते होते बात डायन पर आ गयी। इस बीच स्वाती का जन्म पत्री देखाया गया तो वह मंगली निकली इसके बाद तो उसके उपड़ दुख का पहाड़ ही टुट परी सास का ताना शुरु हुआ और देखते देखते पूरे घर की वह भिलेन बन गयी फिर भी पति का साथ मिलता रहा इस बीच कम्पनी के उतार चढाउ को देखते हुए उसे कम्पनी बदलनी पड़ी और नये कम्पनी में आते ही मंदी का मार पड़ने लगा।चार माह में तीन कम्पनी बदलनी पड़ी और इसके कारण शहर भी बदलता रहा। नौकरी के उठापठक और नये दौड़ के युवाओं में रातो रात करोड़पति बनने और बीबी के साथ फाईव स्टार होटल में रात गुजारने और बीबी हो तो ऐश्वारिया राय की तरह।इस सनक के कारण आज देश का लाखों युवक डिप्रेशन का शिकार हैं।उदारीकरण के दौड़ में रातो रातो इतनी कमाई बढ गयी कि उसका पैर जमीन पर नही रहा और पैसे के दंभ पर वो सब कुछ पाने का ख्वाब देखने लगा जिसके वह काबिल नही था।उसी सनक की शिकार स्वाती बनी हैं आफिस के टेशन के साथ साथ अपने अयोग्यता का ठिकरा स्वाती पर मढने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह यहां तक पहुंच गया कि उसे रात रात भर पिटायी की जाने लगी। सबसे दुखद पहलु यह हैं कि इस मसले पर ससुराल के लोग चुप्पी साधे हुए हैं।स्वाती के लिए आज हर रात एक खोफनाक रात के समान हैं रोज उसे नये नये तरीके से प्रताड़ित किया जा रहा हैं। लेकिन वह सब कुछ सह रही हैं बस इस उम्मीद से की एक दिन ऐसा आयेगा कि उसका सत्या पहले जैसा प्यार करेगा।पता नही कब वह दिन आयेगा लेकिन मैं तो दोराहे पर खड़ा हुं एक तरफ मेरे ससुराल वाले हैं तो दूसरी और मेरी पत्रकारिता मैंने तय किया हैं कि अगर कोई घटना घटती हैं तो मेरी लड़ाई स्वाती को न्याय दिलाने के पंक्ष में रहेगी।शायद मेरे इस व्यवहार से लोग चेते और जेल जाने का डर भी रहे।लेकिन इस मसले का दूसरा पंक्ष यह भी हैं कि लड़की के पंक्ष में उसका बाप भी नही हैं।वो भी अपनी बेटी को यही नसीहत दे रहे हैं कि किसी तरह स्थिति को संभालो। पता नही स्वाती किस हाल में हैं लेकिन मेरा एक सवाल आप सबों से हैं और दुनिया बनाने वाले से भी हैं कि लड़की में जन्म लेना क्या वाकई अभिशाप हैं।यह मेरी लड़ाई हैं नही हैं इस जहां की लड़ाई हैं आपके आसपास रोजना इस तरह के वारदात होते रहते हैं लेकिन हम सब लड़कियों पर आरोप मंढ कर उस पर जुल्म करते हैं य़ा फिर जुल्म होते देखते रहते हैं ।