इतिहास की यह कैसी नियति हैं जिस आपातकाल के खिलाफ बिहार में जेपी के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन हुआ और उस आन्दोलन की उपज बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री बिहार में आपातकाल लागू करने पर आमदा हैं।यह पढकर आप सबों को थोड़ा अटपटा जरुर लग रहा होगा लेकिन यह सच हैं।शायद आज जेपी होते तो 1974 से भी बड़े आन्दोलन की घोषणा करते।आपातकाल के समय जो इंदिरा जी नही कर पायी वह आज नीतीश कर रहे हैं और दुख की बात यह हैं कि बिहार जिसे पूरा देश परिवर्तन के आन्दोलन का प्रणेता मानता हैं आज मूक दर्शक बना हुआ हैं।
नीतीश के कार्यशैली को लेकर पहले भी सवाल खड़े होते रहे हैं लेकिन इस बार मामला कही ज्यादा गम्भीर हैं नीतीश कुमार ने भारतीय संविधान के साथ छेड़छाड़ करने का अदम्य साहस दिखाया हैं लेकिन मीडिया से लेकर सारा तंत्र नीतीश के इस दुसाहस पर चुप हैं।मामला सूचना के अधिकार में कटौती से जुड़ा हुआ हैं।बिहार में लोकतंत्र पर नौकरशाही कितनी हावी हैं इसकी लम्बी चौरी फेहरिस्त हैं ।बिहार में सूचना के अधिकार के तहत अधिकार मांगने वाले सैकड़ो ऐसे व्यक्ति हैं जिन पर प्रशासन ने जुवान बंद करने के लिए झूठे मुकदमें में फसा दिया हैं।कई लोग जेल गये हैं यह सब लोकतंत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार के संरक्षण में चल रहा हैं।मामला जब जोर पकड़ने लगा तो मुख्यमंत्री ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी को लेकर पदाधिकारी द्वारा दमन की कारवाई करने पर टाल फ्रि नम्बर पर शिकायत दर्ज करने की घोषणा की ।लेकिन जिन अधिकारियों ने मौलिक अधिकार को दमित करने के लिए कानून का दुरउपयोग किया उस पर कोई कारवाई नही की नतीजा सामने हैं मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी सूचना मांगने वालों पर दमनात्मक कारवाई जारी हैं।अब तो हद हो गयी राज्य सरकार ने जिस महाश्य को राज्य का मुख्य सूचना आयूक्त बनाया हैं उन्होने तो हद कर दी।पद भार ग्रहण करते ही इन्होने पूरे बिहार के लोक सूचना अधिकारी को केन्द्रीय कार्मिक विभाग का एक पत्र भेजा जिस पर किसी भी अधिकारी का हस्ताक्षर नही हैं।पत्र में सूचना के अधिकार को परिभाषित किया गया हैं जिसमें लोक सूचना अधिकारी को यह अधिकार हैं कि जो सूचना आप को गैर जरुरी लगे उसे देने के लिए आप बाध्य नही हैं।इसी तरह की कई और बाते इस पत्र में लिखा हुआ हैं।पत्र मिलते ही लोकसूचना अधिकारी की बांझे खिल गयी और सूचना मांगने वाले का फर्म ही लेने से यह कहते हुए इनकार करने लगा कि यह सूचना देने लायक नही हैं।ऐसा पत्र जिस पर किसी ओथिरिटी का हस्ताक्षर नही हो और वह पत्र राज्य सूचना के मुख्य आयुक्त के कार्यालय से निर्गत होता हैं तो आप समझ सकते हैं कि सरकार की मंशा क्या हैं।इस पर बहस शुरु ही हुआ था कि नीतीश सरकार मंगलवार को मंत्रीमंडल की बैंठक में यह फैंसला लेते हैं कि अब एक आवेदन में एक ही सूचना मांगी जा सकती हैं और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बीपीएल सूची के लोगों को भी सूचना पाने के लिए दस रुपये देने होगे।जब कि पहले इन्हे मुफ्त में सूचना दी जाती थी।लोगो को यह समझ में नही आ रहा हैं कि जो कानून देश की संसद ने बनायी जिस पर ऱाष्ट्रपति का मोहर लगा और मामला संवैधानिक अधिकार से जुड़ा हैं ऐसे मामले में राज्य सरकार के मंत्रीमंडल को संशोधन करने का अधिकार हैं क्या।संविधानविदों का मानना हैं कि नीतीश सरकार का यह कदम गैर संवैधानिक हैं।आखिरकार जनता द्वारा चूनी गयी सरकार क्यों जनता के अधिकार की कटौंती के लिए संविधान के प्रावाधान के विपरीत कार्य कर रही हैं ।यह सवाल आप सबों से हैं।सोचिए नीतीश कुमार जिस जनता की ताकत पर दंभ भर रहे हैं उसी जनता के साथ यह खिलवाड़ क्यों कर रहे हैं।
महात्मा गांधी हत्या केस-37
9 घंटे पहले





