गुरुवार, मार्च 03, 2011

कोडरमा पुलिस ने निरुपमा मामले मे क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट को सौपी




मित्रों खबरो की भूख ने मुझे ब्लांग से जुड़ने को मजबूर किया था संस्थागत मजबूरियो के काराण कई बार एसहास होता था कि हमलोग खबरो के साथ न्याय नही कर पा रहे हैं ।या फिर जिस उद्देश्य से मीडिया से जुड़े हैं वह कही समय के साथ साथ खोता जा रहा है और जिस अंतिम व्यक्ति की आवाज बनने की सोच को लेकर मीडिया से जुड़ा उसके साथ न्याय नही कर पा रहे हैं।लेकिन ब्लांग के लगभग दो वर्ष के सफर के बाद मुझे बेहद सकून महसूस हो रहा है कि मैं अपने मकसद में बहुत हद तक कामयाब रहा खासकर निरुपमा पाठक के मौंत मामले में जिस तरीके से मीडिया के धाराओ के साफ विपरित निरुपमा के मौंत को लेकर जारी मीडिया ट्रायल को तूती की आवाज के माध्यम से कुंद किया उसको लेकर आज मुझे गर्व महसूस हो रहा है।

आज सभी चुप हैं क्योकि पुलिस ने भी मेरी थ्योरी को ही मौहर लगायी है। पुलिस ने अपने क्लोजर रिपोर्ट में निरुपमा के आत्महत्या की बात लिखी है जिसके लिए निरुपमा के माँ,पिता और भाई के साथ साथ प्रेमी प्रियभांशु को जबावदेह ठहराया है।पूरा अनुसंधान एम्स के डाँक्टर के रिपोर्ट के साथ साथ हैदराबाद के फौरेन्सिक लैब के रिपोर्ट पर आधारित है जिसमें सोसाईड नोट निरुपमा के द्वारा ही लिखे जाने की बात जांच में सामने आयी है।साथ ही एम्स के डांक्टरो की संयुक्त जांच टीम ने निरुपमा की मौंत को आत्महत्या माना है।हैदारबाद लैब ने निरुपमा के लैपटोप के साथ मोबाईल के उन तमाम मैसेज को भी समाने लाया है जिसे प्रियभांशु ने बड़ी सावधानी से उड़ा दिया था।पुलिस इन सभी तथ्यो के आधार पर धारा 306 के तहत कैस को सही पाया है ।इस मामले में दस वर्षो तक की सजा का प्रावधान है।

पाखंडी पंडित परिवार को जितनी सजा मिलनी थी वह मिल चुकी है और अब बारी प्रियभांशु एण्ड कम्पनी की है जिन्होने इस पूरे प्रकरण के दौरान प्रियभांशु के बचाव में अनर्गल अलाप करते रहे।पुलिस के जाँच में जो बाते सामने आयी है उनमें से अधिकांश तथ्यो का मैंने खुलासा अपने ब्लांग के माध्यम से पहले ही कर दिया था।लेकिन पुलिस ने उन बातो को भी अपने अनुसंधान में लिखा है जिसको लिखने से मैं परहेज कर रहा था। निरुपमा के साथ प्रियभांशु का व्यवहार समय के साथ साथ कैसे कैसे बदला सारा कुछ पुलिस के डायरी में दर्ज है। किस तरीके से प्रियभांशु ने निरुपमा के लैपटोप से सारा साक्ष्य मिटाने की पूरी कोशिस की लेकिन हैदरावाद की रिपोर्ट ने प्रियभांशु के सारे मनसूबे पर पानी फेर दिया।प्रियभांशु ने निरुपमा के गर्भवती होने की खबर के बाद किस तरह से निरुपमा को शाररिक और मानसिक रुप से प्रतारित किया वह सब कुछ निरुपमा के लैंपटोप में दर्ज है ।फिर भी इस मामले की सीबीआई जांच को लेकर पहल होनी चाहिए इसलिए नही कि निरुपमा के साथ न्याय नही हुआ इसलिए होना चाहिए कि प्रियभांशु जैसे भेड़िया आये दिन किस तरीके से महानगरो में लड़कियो को अपने जाल में फंसा कर शाररिक और मानसिक शौषण कर रहा है और इससे बचने के लिए किस किस तरह के हथकंडो का उपयोग करते हैं।इस पूरे प्रकरण में जिन जिन लोगो ने मुझे हौसला अफजाई किया उन्हे स हद्यय धन्यवाद ।साथ ही उन मित्रो को भी धन्यवाद जिन्होने इस पूरे प्रकरण में मेरी माँ बहनो को भी गाली देने से नही चुंके।




गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

बिहार के पत्रकारो को अब खोने के लिए कुछ भी नही बचा है

बिहार में विधानसभा का सत्र चल रहा है बुधवार को राज्यपाल के अभिभाषण पर विपंक्ष के नेता अब्दुलबारी सिद्दीकी को बोलना था।जैसी उम्मीद की जा रही थी उससे कही जबरदस्त प्रस्तुति सिद्दीकी का रहा। पूरा सदन खामोस होकर सिद्दीकी की बात सूनता रहा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चेहरा छुपाये अपने किये से मुख मोड़ते दिखे।राज्य में कानून व्यवस्था से लेकर राज्य सरकार द्वारा अधिकारियो के चयण के मामलो में पैसा और जाति का नग्गा खेल खेलने का तथ्य सदन के सामने रखते हुए सिद्दीकी ने मुख्यमत्री को खुली चुनौती दी ।

आशर्चय जनक तो यह रहा है कि जिस तेवर मे सिद्दीकी बोल रहे थे और पूरा सदन ऐसा खामोस था जैसे सिद्दीकी की बातो से सभी सदस्य सहमत हो वही नीतीश अपने अगल बगल झाक रहे थे लेकिन मौंन समर्थन से अधिक कुछ भी नही मिल पा रहा था।सवाल ही ऐसा था भ्रष्टाचार को लेकर इन दिनो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जो बयान आ रहे हैं उस पर चुटकी लेते हुए सिद्दीकी ने खुली चुनौती दी कि राजधानी पटना के एपार्टमेंन्ट खरीदार की सूची सरकार सार्वजनिक करे 75प्रतिशत ऐपार्टमेंन्ट सूबे के भ्रष्टअधिकारी है जो राज्य की जनता का हकमारी कर मुख्यमंत्री के आंखो के तारे बने हुए है।वही सबसे बड़ा सवाल उन्होने सदन के सामने रखा कि आखिर मुख्यमंत्री जो आये दिन आम जनता को जाति और धर्म से उपर उठ कर बिहारी बनने की नसीहत देने वाले मुख्यमंत्री तमाम नियम कायदो को ताख पर रख कर अपनी जाति के ही आइएस अधिकारी जो दूसरे स्टेट कैंडर के हैं उन्हे ही पटना का डीएम क्यो बनाया जा रहा है।पटना के एसएसपी जिन्हे बनाया गया है उनका नाम जम्मू काश्मीर में गैरजिम्मेदार अधिकारी के रुप में दर्ज है ।पिछले छह माह पहले बिहार डिपटेशन पर आया है और बिहार के किसी भी जिले के पुलिस कप्तान के रुप मे कोई अनुभव नही है लेकिन उन्हे पटना का सीनियर एसएसपी बना दिया गया क्योकि वह नीतीश कुमार के गृह जिले का रहने वाला है।भष्टाचार को लेकर कई उदाहरण दिये जिसमें समाजकल्याण से जुड़े योजनाओ को किस तरह के अधिकारी अपने बीबी बच्चा के नाम पर एनजीओ खोलकर लूट रहे हैं।सिद्दीकी ने इसकी पूरी सूची सदन के पटल पर रखा लेकिन दुर्भाग्य है आज राजधानी के किसी भी अखबार में सिद्दकी के इस आरोप की चर्चा तक नही है पूरा पेज फिलगुड से भरा है आखिर हम चाहते क्या हैं हम क्यो पार्टी बन रहे हैं पत्रकारिता कभी भी रोजगार नही हो सकता है हमारी पूंजी विश्वास है उसको क्यो दाव पर लगाये।





रविवार, फ़रवरी 06, 2011

बिहार में जूनियर डाँ के सामने क्यो बेवस है सरकार

बिहार मे कानून का राज्य है ऐसा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर बोलते रहते है,लेकिन जूनियर डाँ के मामले में ऐसा होता नही दिख रहा है नीतीश कुमार के शासनकाल में जूनियर डाँ पर मरीज के परिजन के साथ मारपीट करने और सरकारी सम्पत्ति को तोड़फोड़ करने को लेकर 28मुकदमा सूबे के विभिन्न थानो में दर्ज है।लेकिन उन मुकदमो पर कोई कारवाई आज तक नही हुई है।इनके हड़ताल पर जाने  के कारण दो सौ से अधिक मरीजो की मौत हो चुकी है।मरने वालो में अधिकांश वही थे जिनका मसिहा होने का दावा नीतीश कुमार करते हैं।मानवाधिकार आयोग ने जूनियर डाँ के इस आचरण को गैर कानूनी मानते हुए मरीजो के मौत के लिए जूनियर डाँ को जबावदेह ठहराया था यह फैसला दो वर्ष पूर्व  आया है।आयोग राज्य सरकार से उन जूनियर डाँ की सूची पिछले दो वर्ष से लगातार माँग रही है जो इस मामले में आरोपित है।लेकिन सरकार सूची देने से आना कानी कर रही है, नीतीश कुमार पर सीधा आरोप है कि जूनियर डाँ में अधिकांश चर्चित रंजीत डोन का प्रोडक्ट है और मुख्यमंत्री के स्वजातीय है जिसके कारण उन जूनियर डाँ पर कारवाई नही हो रही है तहकिकात के दौरान लोगो का आरोप लगभग सही पाया गया है। अब आप ही बताये सूबे मे कानून का राज्य है क्या---

रविवार, जनवरी 09, 2011

इस बेपनाह अंधेरे को सुबह कैसे कहूं इन नजारो का मैं अंधा तमाशवीन नही

सभी मित्रो को नव वर्ष की शुभकामनाये काफी दिनो बाद आपसे मिल रहा हूं विषय ऐसा है कि आपके लिए कुछ विशेष जानने के लिए बचा नही होगा,सरकार पूरे मामले की जाँच सीबीआई से कराने की अनुशंसा कर दी है।अब सारा खेल सीबीआई के पाले में है अब आप भी समझ गये होगे कि मैं किस मामले में बात कर रहा हूं। वही मामला पूर्णिया विधायक की हत्या का जिसमें सरकार के उप मुख्यमत्री सुशील कुमार मोदी अपने बयानो के कारण विवाद में घिरे हैं।फिर भी मैं इस पूरे प्रकरण के उन पहलुओ से आप सबो को अवगत करा रहा हूं जो अभी भी मीडिया के सुर्खियो में नही है या यू कहे तो मीडिया इन पहलुओ को छूने से परहेज कर रही है।अखबार ने अपनी भूमिका से पत्रकारिता को शर्मसार तो कर ही दिया लेकिन पहली बार पांच वर्षो के बाद प्रिंट मीडिया का वह दंभ चकनाचूर हुआ है कि जब तक मैं पहल नही करुंगा कोई मामला सुर्खियो में नही आयेगा।

वही दूसरी और इस पूरे प्रकरण में बिहारी समाज का वह चेहरा सामने आया है जिसकी कल्पना मैने नही की थी ।बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि बिहारी समाज जिसकी संवेदनशीलता की देश भर में चर्चाये हुआ करती थी वह समाज इतना कुंद हो गया इसका एहसास मुझे पहली बार इस पूरे प्रकरण में देखने को मिला।घटना चार जनवरी की है मेरा मोरनिंग सिफ्ट था कड़ाके की ठंड के कारण थोड़े विलम्भ से दफ्तर पहुंचा स्टोरी को लेकर मंथन चल ही रहा था कि डीजीपी का मैसेंज आया जैसे ही मैंसेज बोक्स खोला होश उड़ गये पूर्णिया विधायक की हत्या ,हत्या उसी महिला ने की जिसने विधायक पर यौन शोषण का आरोप लगाया था।शुरु हो गया ब्रेकिंग न्यूज का सिलसिला तभी खबड़ आयी कि इस मामले में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कुछ कहना चाह रहे है।भागे भागे उनके पोलो रोड स्थित सरकारी आवास पर पंहुचा उपमुख्यमंत्री इस मामले पर बोलना शुरु किये शुरुआत महिला के चरित्रहीन,ब्लैक मेलर के उपमा से हुआ वही विधायक को 1974के आन्दोलन का सिपाही होने की बात करते हुए उसके महानता की गाथा सुनाने लगे जैसे कि 1974 का आन्दोलन देश के आजादी का आन्दोलन हो।

टीवी स्क्रिन पर मोदी का बयान चलने लगा रुपम पाठक चरित्रहीन है ब्लैक मेलर है विधायक की एक बड़ी साजिश के तहत हत्या की गयी है।इस बयान के बाद मैने कई महिला संगठनो के प्रतिनिधियो से बात किया लेकिन मोदी के इस बयान पर उन्होने प्रतिक्रिया व्यक्त करने की इक्छा जाहिर नही की ऐसे मैं ऐसे महिलाओ की राय लेकर स्क्रिन पर चलाने का फैसला लिया गया जो सिर्फ महिलाये थी उनका कोई समाजिक और राजनैतिक पहचान नही थी ।वही बाद में जब मामला गरमाने लगा तो वही महिलाये चीख चीख कर महिलाओ के स्वाभिमान पर आघात की बात करते हुए हल्ला बोल दिया।

दूसरा पहलु तो इससे भी दुखद है लोग मोदी के बचाव में खुलकर बोलने लगे हैं और स्थिति यहां तक आ गयी है कि जिस तरीके से लालू प्रसाद पर चारा घोटाला का आरोप लगा था तब बिहारी समाज का एक बड़ा तबका समाजिक न्याय के नाम पर लालू प्रसाद के बचाव में खुलकर सामने आये थे और आज वही स्थिति है सुशासन और विकास के नाम पर बिहारी समाज का एक बड़ा तबका इस मामले को सही साबित करने मे लगा है।

लेकिन इन सबसे दूर रुपम पाठक के साथ आज उनका पूरा परिवार खड़ा है उनकी माँ जहाँ बेटी के कदम को सही ठहरा रही है वही उनका पति इस हत्या को वध की संज्ञा देने की बात करते हुए पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात कर रहे है।फिर भी मेरा बिहारी समाज सोया हुआ है और मजा ले रहा है और बेशर्म की तरह सवाल कर रहा है कि क्या रुपम की बेटी पर भी विधायक हाथ फेर दिया।

रविवार, दिसंबर 05, 2010

आज के पत्रकारिता की हकीकत है बरखा दत्त


लगभग एक माह से बरखा दत्त को लेकर पूरे मीडिया में जंग छिड़ा है वीर साहब तो अपना काँलम लिखना बंद कर संन्यास पर जाने के संकेत दे दिये लेकिन बरखा दत्त को लेकर अभी भी खीचतान जारी है।एनडीटीवी भले ही उसका बचाव करे लेकिन बरखा दत्त अपना सब कुछ लूटा चुकी है।लेकिन सच यही है कि आज अधिकांश पत्रकार किसी न किसी स्तर पर बरखा दत्त की तरह लोबिंग करने में जुटे हुए हैं।यह अलग बात है कि बरखा दत्त और वीर सांघवी इस खेल में ऐक्सपोज हो गये और आज यह मुद्दा होटकैक बना हुआ है।लेकिन यह तो आज न कल होना ही था आखिर बकरा कब तक खेर मनायेगा। सवाल यह है कि पत्रकारिता का धंधा भले ही विश्वास का धंधा है लेकिन इस धंधे को चलाने वालो को मुनाफा चाहिए है और अपने गलत कमाई को इस धंधे के सहारे जारी रखने का जरिया चाहिए ।जब उद्देश्य ही गलत है तो फिर इससे बेहतर परिणाम की बात सोचना ही बेमानी है।आखिर कोई भी मालिक जनता के लिए लाखो की पगार क्यो आप पर खर्च करेगा। कोई भी व्यवसायी सौ करोड़ से अधिक की पूंजी का निवेश जनता के लड़ाई के लिए क्यो करेगा कई ऐसे सवाल है।

जिस तरह के लोग पत्रकार बन रहे है उनसे क्या उम्मीद कि जा सकती है वे तो नौकरी करने आये हैं। जहां बेहतर पगार मिलेगा वही नौंकरी करेगें।साथ ही नौकरी में बने रहे इसके लिए ऐसे डिल करने पड़ते है।यह तो अब आप पर निर्भर करता है कि आप इस तरह के डिल में अपना दामन कब तक दागदार होने से बचाते रहते हैं।

सवाल यह भी हैं कि काम कोयले के खादान में करेगे और फिर कालिख लगने से परहेज करेगे यह कैसे सम्भव है। मित्रों वक्त आलोचना करने का नही है बरखा दत्त के हस्र से सीख लेने का है ।पूरी मशीनरी चौथे खम्भे को लेकर कही ज्यादा संवेदनशील हो गया है ।लोग चाहते हैं कि मेरी मर्जी पर कोई रोक न लगाये, कानून का हाल तो आप देख ही रहे हैं कोर्ट अपने गिरेवान में झांकने के बजाय दूसरे को नसीहत देने में लगा है ।ऐसे मैं आपकी जबाबदेही कही ज्यादा बढ गयी है लेकिन इस मैंदान में जमे रहने के लिए इस तरह के कार्य करने की मजबूरी भी है लेकिन इस मजबूरी से बाहर निकलने का कोई मान्य फर्मूला नही है। ऐसे में सब कुछ आपके विवेक औऱ सोच पर निर्भर करता है।वक्त आ गया है अपने आपके बारे मैं सोचने का, बरखा दत्त के तेवर को मरने न दे, भले ही एक बरखा सिस्टम की भेंट चढ गयी लेकिन सौ बरखा के पैदा होने जैसी उर्वर भूमि अभी भी मौंजूद है। आलोचना के बजाय बरखा की उन अदाओ का जिन्दा रखने की जरुरत है जो आज भी करोड़ो भारतीयो के दिल पर राज कर रही है।

रविवार, नवंबर 28, 2010

बिहार की जनता ने अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया


बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम को लेकर विशलेषण का दौड़ जारी है।एक और जहां नीतीश कुमार में लोग देश के प्रधानमत्री की छवी देखने लगे हैं, तो वही दूसरी और विशलेषक परिणाम को मडंल राजनीत के होलिका दहन के रुप में भी देख रहे हैं।वही मुख्यमत्री नीतीश कुमार की अपनी एक अलग व्याख्या है और जनता के इस अपार समर्थन से थोड़ा घबराये हुए हैं। उनकी घबराहट से मैं भी इत्फाक रखता हूं,हो सकता है वे इतनी दूर तक नही सोचते होगे लेकिन मेरा मानना है कि बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम भारतीय लोकतंत्रातिक व्यवस्था के लिए मील का पथ्थर साबित होगा।जिस उम्मीद से मतदाताओ ने नीतीश कुमार को वोट दिया है उस पर अगर नीतीश खड़े नही उतरे तो भाई यह बिहार है ऐसी प्रतिक्रिया होगी कि मैं सोचकर ही घबरा जाता हूं।मैंने पिछले लेख में नीतीश कुमार के आपार बहुमत से जीतने की बात लिखा था साथ ही मैंने यह भी लिखा था कि जनता में भ्रष्टाचार को लेकर खासा आक्रोश है। मेरी नीतीश कुमार से राय है कि भ्रष्टाचारियो को कानून के सहारे रोका नही जा सकता है कृप्या करके भ्रष्टाचार को नियत्रित करने वाली जो ऐंजसी उपलब्ध है उसकी आजादी बनाये रखे।सूचना के अधिकार कानून पर जो पाबंदी नीतीश कुमार ने लगा रखी है उसे मुक्त करे अधिकारियो को जबाबदेह बनाये सूचना नही देने वाले अधिकारियो के पंक्ष में नही खड़े हो।राज्य मानवाधिकार आयोग के निर्देश के पालन में जाति नही देखे।वही लोकपाल और उपभोगता फोरम जैसी संस्थान को मजबूती प्रदान करे नही तो जिस अंदाज में बिहार में हिंसक प्रवृति बढ रही है उसे रोकना काफी मुश्किल होगा।

वामपंथी पार्टियां खासकर भाकपा माले के बिहार विधानसभा चुनाव में शून्य पर आउट होने पर नक्सलियो की जो प्रतिक्रिया आयी है वह बेहद गम्भीर है और सरकार को नक्सली नेता के बयान को गम्भीरता से लेनी चाहिए।माओवादी संगठन के प्रवक्ता ने चुनाव परिणाम पर प्रतिक्रिया वयक्त करते हुए कहा कि चुनाव लड़ने वाली कम्युनिस्ट पार्टिया जिस तरह संसदीय भटकाव में फंसी थी उसमें इनकी यही दुर्गिति होनी होनी थी।वही भाकपा माले जो वर्ग संधर्ष और संसदीय संघर्ष को एक साथ मिलाने का दावा किया वही खुद संसदवाद के दलदल में फंस गई।कई इलाको में भाकपा माले इन्ही तर्क के आधार पर गरीबो को लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़कर रखे हुए था और गरीबो को लगता था कि वे हमारे हक और हकुक की बात करते हैं। लेकिन बिहार के राजनीत में यह पहला मौंका है जब विधानसभा में लाल झंडा का एक मात्र प्रतिनिधि पहुंचा है।चर्चित नक्सली नेता उमाधर सिंह जिन्हे पहली बार इस तरह से जनता ने खारिज कर किया है उन्हे मांत्र चार हजार के करीब वोट आया है जबकि आम अमाव और भ्रष्टाचारियो के खिलाफ आवाज उठाने वाले राजनेताओ में इनकी गिनती होती है।

मुझे जनता के इसी आचरण से डर लग रहा है क्योकि नीतीश कुमार की जो छवि जनता के सामने है वह पूरी तौर पर मीडिया का क्रियेसन है जिसमें सच्चाई का दूर दूर तक वास्ता नही है।जब भ्रष्टाचारियो को मुख्यमंत्री सचिवालय से ही संरक्षण मिलेगा तो फिर भ्रष्टाचारियो पर कैसे नकेल कसेगी।लालू के कभी नम्वर वन सलाहकार रहे श्याम रजक से क्या उम्मीद की जा सकती है वैसे कई मंत्री इनके मंत्रीमंडल में शामिल हुए जिनकी योग्यता सिर्फ और सिर्फ जात है।

जनता ने तो जात आधारित राजनीत को पूरी तौर पर नकार दिया लेकिन लगता है राजनेता इस जीन को बचाकर रखना चाहते है।हलाकि मैं नीतीश कुमार को लेकर कोई खुश फोमी पाल नही रखा था लेकिन जो दिन में सपने देख रहे थे उन्हे नीतीश के मंत्रीमंडल गठन से थोड़ा झटका जरुर लगा है।कई दागी और काम चोर चेहरा इस बार भी मंत्रीमंडल में शामिल किये गये है और काम करने वाले मंत्री को कमजोर मत्रांलय दिया गया है।वही सरकार द्वारा कार्यभार ग्रहण करने के बाद जो पहली नियुक्ति हुई है महाअधिवक्ता के पद पर वे मुख्यमंत्री के विरादरी का है।

देखिये आगे आगे होता है क्या --

गुरुवार, नवंबर 18, 2010

कई मायने में ऐतिहासिक रहा बिहार विधानसभा का चुनाव


बिहार विधानसभा चुनाव लगभग समाप्ति पर है और अब सबो की नजर चुनाव परिणाम पर टिकी हुई है।उम्मीद की जा रही है की चुनाव परिणाम बिहार की जनता के लिए खुशहाली और समृद्धि लेकर आयेगी। क्यो कि पहली बार बिहार के वोटरो नें जाति,धर्म,मजहब,नाते रिश्ते को तोड़कर विकास और समाजिक समरसता के नाम पर वोटिंग किया है।मतदाताओ ने एक और जहां नीतीश कुमार के विकास और सुशासन के दावे पर मोहर लगा दी, वही नीतीश कुमार के अंहकार और राज्य में जारी अफसरशाही औऱ भ्रष्टाचार को लेकर खिचाई भी किया है। यही कारण रहा कि प्रथम चरण के चुनाव के बाद नीतीश कुमार जहां भ्रष्टाचारियो की सम्पत्ति जप्त करने की घोषणा कर मतदाताओ की वाहवाही लूटे। वही दूसरी और लालू प्रसाद ने अफसरशाही खत्म करने का भरोसा दिलाकर ऱुठे मतदाताओ को मनाते दिखे।लेकिन पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जो अहम बाते रही की मतदाताओ ने नीतीश कुमार के एक बार और मुख्यमत्री बनाने की अपील को काफी गम्भीरता से लिया ।लेकिन इसका असर चुनाव परिणाम पर कितना पड़ता है ये तो परिणाम आने के बाद ही सामने आयेगा।

पूरे चुनावी अभियान के दौरान नीतीश कुमार के पास कोई टिंक टैंक जैसी बाते देखने को नही मिला जो पार्टी उम्मीदवार के नकारात्मक पंक्षो के काऱण जनता में उपजे आक्रोश को नियंत्रित कर सके। और यही कारण है कि जनता के अपार समर्थन के बावजूद नीतीश मंत्रीमंडल के अधिकांश मंत्री और विधायक की विधायकी खतरे में है।अगर परिणाम प्रतिकुल होता है तो इसमें जनता से कही अधिक गुनाहगार खुद नीतीश कुमार होगे जिन्होने टिकट बटवारे से लेकर पूरे चुनाव अभियान के दौरान जनता के भवानाओ को दरकिनार करते दिखे।लेकिन इन सबके बावजूद जनता ने जो दिलेरी दिखायी है वह वाकई देखने लाईक था।

नीतीश कुमार का नालंदा के रहुउ में 11बजे सभा होनी थी लाईफ कभरेज हो इसके लिए पूरी टीम के साथ सुबह 9.35में ही सभा स्थल पर पहुंच गये थे।कार्यक्रम नीतीश कुमार के कर्मभूमि पर होने वाला था इसलिए सभी की पैनी नजर चुनावी सभा पर टिकी हुई थी।सभा स्थल पर एक बूढा व्यक्ति जिसकी उर्म 55 के करीब होगा लेकिन देखने में 75के करीब लग रहा था डी एरिया के बाहर बैंठा हुआ था उस समय कुछ पुलिस को छोड़कर कोई नही पहुचा था जैसे जैसे सभा का समय करीब होने को हो रहा था लोगो के आने का सिलसिला तेज होने लगा और नीतीश कुमार जब पहुंचे तो पूरा मैंदान भरा हुआ था नीतीश कुमार जिन्दावाद का नारा लग ही रहा था कि पीछे से कोई व्यक्ति बार बार चिल्ला रहा था तनी हटहो(जरा हट जाये)मैंने पलट कर देखा वही बूढा चिल्ला रहा था जो डी एरिया में मीडियाकर्मियो के ट्रायपोर्ट लगने के कारण नीतीश कुमार को नही देख पा रहा था मै उसके पास गया औऱ डी ऐरिया के बाहर लगे बांस के बल्ले के नीचे से आने का इशारा करते हुए उन्हे मीडिया सेंन्टर में ले आया औऱ उसके बाद मैंने अपनी कुर्सी में बैंठा दिया पूरे भाषण के दौरान मेरी नजर जब भी उस बूढे व्यक्ति पर पड़ता देखता की वह टकटकी निगाह से नीतीश कुमार को देख रहा है।भाषण खत्म हुआ नीतीश उड़ चले हम लोग समान पैंकप करा रहे थे तभी मुझे लगा कि पीछे से कोई व्यक्ति आशिर्वाद देना चाह रहा है जैसे ही पलटा सामने वही बूढा व्यक्ति खड़ा था मैने पुछा बाबा गये नही है नही बाबू तोड़ से मिलले बिना कैसे जतियो(तुमसे मिले बगैर कैसे जाते, मैनें पुछा बाबा नीतीश जी की कहलथून बड़ी शांत भाव से उन्होने कहा बाबू अंतिम आस इही छे मैने पुछा क्या कहा बाबा, तो उन्होने कहा लोग कहे रहे अपन सरकार बनले 15वर्ष लालू के इही नाम पर वोट देलिए पांच वरस नीतीश बबुआ के वोट देलिए औऱ इही बेर द रहल बानी लेकिन गरीब के भला नही भेल तो अनर्थ भे जाईते, मैने पुछा क्यो बूरा होगा, बाबू नईका छौड़ा(लड़का, सब हथियार उठवे के बात करे छे गरीब के भला नही भले त बाबू बढ बूरा दिन आवे वाला छई,55वर्ष से इ नाटक चली रहल छई पहले कही छले बड़का सब लूट ले छई लेकिन बीस वर्ष से बिहार में गिरिबहे के बेटा मुख्यमंत्री होई रहल छई ओकरा बादो गरीब के देखे वाला कोई नही है।

उस बूढे की बात जब जब जेहन में आता है मेरे सामने अंधेरा छा जाता है और आने वाले बिहार को लेकर चिंतित हो उठता हूं।वाकई बिहार का यह चुनाव या तो बिहार की दिशा और दशा को बदल देगी या फिर घोर निराशा के खाई में इतने नीचे चला जायेगा कि जहां से निकलना मूमकिन ही नही पूरी तौर नामूमकिन होगा।