रविवार, फ़रवरी 14, 2010

नीतीश के दामन पर लगा दाग मीडिया की खुली कलई

नीतीश सरकार पर पहली बार घोटाले का आरोप लगा हैं आरोप किसी विपक्षी पार्टी ने नही लगाया हैं बल्कि इनके मंत्रीमंडल के सदस्य ने लगाया हैं।आरोप हैं शराब माफियाओं के साथ मिलकर दस हजार करोड़ के घाटाले का।उत्पातमंत्री जमशेद असरफ ने इस घोटाले मैं मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका पर भी सवाल उठाया हैं।मंत्री की माने तो विभाग में जारी घोटाले को लेकर पिछले छह माह से मुख्यमंत्री से मिलने का समय मांग रहे हैं लेकिन मिलने का समय तक नही दिया जा रहा हैं।मजबूरन केविनेट की बैंठक में घाटाले से जुड़ी तमाम बाते साक्ष्य के साथ मुख्यमंत्री को लिखित रुप में दिये लेकिन कारवाई नही हुई।मंत्री की माने तो घोटाले को लेकर पिछले छह माह से लगातार फाईल पर लिख रहा हू लेकिन मंत्री के विरोध के बावजूद इस पर रोक नही लगा। इस घोटाले का तार नीतीश के सुशासन की सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही शुरु हो गया था।जरा आप भी गौर करे।नीतीश सरकार सत्ता सम्भालते ही निर्णय लिया कि सरकार शराब खुद बेचेगी और इसके लिए बिहार राज्य बेब्रिज कांरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया। जो शराब के बिक्री का कार्य करेगा।उस समय उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने शराब माफिया को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाने की बात कही थी।नयी नयी सरकार बनी थी लोगो को भी लगा कि सरकार जनता के हित में ही यह फैसला लिया हैं। लेकिन धीरे धीरे सरकार की मंशा सामने आने लगी और सरकार की भूमिका इस्टइंडिया कम्पनी जैसी हो गयी। शराब बैचने के लिए गांव गांव में लाइसेन्स दी जाने लगी और आज स्थिति यह हैं कि गांव में दवा की दुकान नही हैं लेकिन शराब की दुकान कही भी मिल जायेगी।सरकार के आकड़ो को ही माने तो सूबे में दुध से अधिक शराब की बिक्री हो रही हैं।


इस पूरे घोटाले में विजय माल्या की कम्पनी मैकडेव्ल की भूमिका प्रमुख मानी जा रही हैं।जिस पर सरकार के मिली भगत से अन्य राज्यों की तुलना में तीन सौ रुपया प्रति पेटी अधिक मुल्य पर बेब्रिज द्वारा शराब खरीदने की बाते सामने आयी हैं।मामले में कितनी सच्चाई हैं यह तो जांच के बाद ही सामने आयेगी लेकिन विजय माल्या के बिहार प्रेम से लोगो को संदेह जरुर बढा हैं और मंत्री के दावे पर किसी निष्पक्ष ऐजेसी से जांच कराने की बात जायज लग रही हैं।मामला सिर्फ अधिक कमित पर शराब खरीदने से ही नही जुड़ा हैं मामला स्प्रीट के खरीदारी से भी जुड़ा हैं।सरकार पिछले वर्ष मार्च से जून तक दूसरे प्रदेशों को स्प्रीट बेचती हैं और फिर मांग की पूर्ति नही होने की बात कर 60रुपया एल पी अधिक मुल्य में उत्तर प्रदेश की सरकार से बेब्रिज स्प्रीट की खरीदारी करता हैं।आखिर सवाल यह हैं कि जब आपके पास मांग के अनुसार स्प्रीट उपलब्ध नही था तो फिर बेचने की क्या जरुरत थी संदेह यही से पैंदा हुआ और इस खरीदारी औऱ बिक्री में हजारो करोड़ के लेन देन की बात की जा रही हैं।

मामला जो भी हो लेकिन सुशासन की इस सरकार की कलई खुल गयी हैं।नीतीश कुमार को इस पर जबाव देनी चाहिए सिर्फ इतने कहने भर से कि नीतीश को खरीदने के लिए कोई टकसाल नही बना हैं यह कहना काफी नही हैं।मंत्री द्वारा उठाये गये सवालों का जबाव तो आना ही चाहिए।

तस्वीर का दूसरा पंक्ष तो नीतीश सरकार से भी घिनौना हैं।उत्पाद मंत्री पिछले छह माह से इस घोटाले को लेकर मीडिया को लगातार बताते रहे लेकिन किसी ने भी इतनी बड़ी खबर को छापने की जहमत नही उठाई शुक्रगुजार माने बीबीसी की जिसने इस घोटाले को पूरे विश्व में उजागर किया ।फिर भी इस मसले पर बिहार की मीडिया खामोस ही रही शुक्रगुजार सूचना जनसम्पर्क मंत्री की माने जिन्होने एक अखबार के विज्ञापन पर रोक लगा दिया प्रबंधक से लेकर संपादक तक इसके लिए मंत्री के दरवार में माथा टेकते रहे लेकिन मंत्री ने एक न सुनी तो महाशय इस खबर को मुख्य पृष्ट पर छापकर नीतीश सरकार को खुली चुनौती दे दी।कहते है खबर छपते ही सरकार सक्रिय हुई और अखवार के प्रबंधक से विज्ञापन के नाम पर समझौता हो गया।यह आरोप अखवार पर आम पाठकों ने लगाया हैं क्यो कि जिस अखबार ने इतने बड़े धोटाले के पर्दाफास करने का दावा कर रही थी, कल होकर अचानक यह खबर अखबार के पेज पर से गुम हो गयी।पाठको का शंक लाजमी हैं और यह सवाल खड़ा करना की वैश्या की भी अपनी मर्यादा होती हैं कही से भी अमर्यादित नही हैं।

रविवार, फ़रवरी 07, 2010

मुझे अपनो ने ही लूटा गेरौ में कहा दम था

चुनाव आयोग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति ने पैसे लेकर खबर छापने की जमकर आलोचना की थी। यह मामला अभी शांत भी नही हुआ था कि फिल्म रण ने मीडिया की कलई खोल कर रख दी। पटना में तो वाकायदा एक संगठन ने सभी मीडिया हाउस को रण फिल्म देखने के लिए आमंत्रित भी किया बड़ी संख्या में पत्रकार फिल्म देखने भी गये पता नही फिल्म का असर पड़ा भी की नही।वही दूसरी और मीडिया के कार्यशैली पर पटना में दो दो सेमीनार हुए हैं जिसमें लोगो ने मीडियाकर्मियों पर जमकर भरास निकाली।यू कहे तो बिहार में इन दिनों मीडियाकर्मी के कार्य को लेकर पूरे समाज में बहस छिड़ी हैं।आमलोग खुलकर आलोचना करने लगे हैं गांव की चौपाटी पर या फिर किसी सरकारी दफ्तर में या फिर किसी कांलेज के कैम्पस में चले जाये मीडिया को लेकर बहस हो रही हैं।कभरेज करने जाये कही न कही से यह आवाज जरुर सुनाई देती हैं कि अरे यह साला सब बिका हुआ हैं।पटना में यह वाकया आये दिन बढता ही जा रहा हैं लोगो का विश्वास लगभग समाप्ति की और हैं राजनैतिक दलों का हाल तो यह हैं कि संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों को खरी खोटी सुनाते है और कहते हैं आप तो नही ही छापेगे।इन दिनों बिहार के कांग्रेसी नेता मीडिया वालो से काफी खफा चल रहे हैं।राहुल गांधी ने पटना में पत्रकारो से बात करते हुए कहा था कि नीतीश की नीयत सही हैं लेकिन इनपिलीमेनटेशन में पूरी तौर पर असफल हैं।लेकिन अखवार वालों ने बयान ही बदल दिया राहुल बोले नीतीश के इरादे नेक पर काम में कमी, इसी तरह किसी अखवार ने छाप दिया राहुल ने नीतीश की तारीफ की।यह तो बानगी हैं बिहार कोई आये पहला सवाल पत्राकारों का होगा बिहार कैसा लग रहा हैं भला कौन कहेगा कि बिहार बूरा हैं कहा और बस सुबह के मुख्यपृष्ठ की लीड खबर होगी अमेरिकन राजदूत ने नीतीश के कार्यशैली को सराहा,बिहार बदल रहा हैं।एक वर्ष के अखबार को देखेगे तो इस तरह के हेंडिग आये दिन देखने को मिलेगा।अब तो आम पाठक भी बिहार साईनिंग और फिलगुड की बात करने लगे हैं।एक गैर पत्रकार मित्र द्वारा इस और इंकित करने पर मैने भी एक अभियान चलाया कि अखबार बिहार को लेकर जो खबरे लिख रहे है उसकी पड़ताल की जाये


जरा आप भी गौर करीये जिस पत्रकार ने बिहार के मैरेकल इकोनोमीग्रोथ को लेकर कांलम लिखा उसी पत्रकार ने 25अप्रैल 2007को लिखा था कि लालू नेहरु से भी बड़ा नेता  हैं और इसके कार्यकाल में बिहार का इकोनोमीग्रोथ पंजाब से भी अधिक था हलाकि इस आलेख में लालू के कार्यकाल के दौरान की खामिया भी गिनायी गयी हैं लेकिन लेख के माध्यम से लालू का महिमामडित ही किया गया हैं।(इंडेक्स से सहारे आप लेख पढ सकते हैं।)इसी तरह इकोनोमीस्ट पत्रिका बिहार के बारे में लिखा लेकिन अखबारों ने पत्रिका की आधी बात छापी और ऐसी बाते भी छापी जो उस लेख में लिखा ही नही हैं।ऐसे कई उदाहरण हैं। पता नही बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन को लेकर इस तरह की खबर लिखने की होड़ क्यो मची हुई हैं।मेरी नजर में  पत्रकार शायद इस दुनिया के पहले प्रोफेसनल हैं जो अपने प्रोफेसन की साख दाव पर लगा कर व्यापार कर रहे।
1-Laloo Yadav beats Nehru hollow

25 Apr 2007, 0043 hrs IST, Swaminathan S Anklesaria Aiyar,
2-India's new miracle economies: Bihar, poor states                                                                                     3 Jan 2010, 1020 hrs IST, Swaminathan S Anklesaria Aiyar, ET Bureau
3--Bihar has blossomed under Nitish Kumar. But his reforms need deeper roots                                          Jan 28th 2010
PATNA
From The Economist print edition
4--हिन्दुस्तान,30जनवरी2010,पटना ऐडिसन
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका इकाँनामिस्ट ने ताजा अंक में नीतीश को सराहा
बिहार की विलक्षण उपलब्धि(नई दिल्ली डेट लाईन से ऐंजसी की खबर हैं)

5--हिन्दुस्तान,3फरवरी 2010,पटना ऐडिसन

राहुल बोले,नीतीश के इरादे नेक पर काम में कमी









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सोमवार, जनवरी 25, 2010

नीतीश कुमार की कार्यशैली पर उठा सवाल


नये वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आपका स्वागत हैं काफी लम्बे अर्से बाद ब्लांग पर आपसे मिल रहा हूं।सोचा था नये वर्ष में नये तेवर के साथ आपसे मिलेगे लेकिन पिछले एक माह से जारी कड़ाके की ठंड ने पूरी योजना पर पानी फेर दिया।नही चाहते हुए भी एक बार फिर नीतीश कुमार को लेकर लिखना पड़ रहा हैं इस बार मामला और भी गम्भीर हैं लेकिन आश्चार्य यह हैं कि इस मसले पर विपक्ष के साथ साथ सभी स्तम्भ खामोश हैं।मामला भारतीय संविधान के अनदेखी से जुड़ा हैं।आप सबों से भी राय अपेक्षित हैं बिहार सरकार ने बीपीएससी के अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी को राज्य सूचना आयोग का मुख्य आयुक्त नियुक्त किया हैं संविधान के अनुच्छेद 319के अनुसार संघ लोकसेवा आयोग और राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्य या अध्यक्ष को राज्य सरकार द्वारा किसी और पद पर नियुक्त नही किया जा सकता हैं।लेकिन नीतीश कुमार ऐसा किये हैं अशोक कुमार चौधरी वही हैं जो बीपीएससी के अध्यक्ष बनने से पहले बिहार का चीफ सैक्रट्री थे औऱ इन पर अपने बेटी का मेडिकल कांलेज में गलत तरीके से नामंकन करवाने का आरोप हैं इसके आलावा भी इनका सर्विस काल साफ सुथरी नही रही हैं लेकिन जातिये समीकरण और सरकार के इशारे पर काम करने में फिट बैठने के काऱण सरकार इनके लिए संविधान को ताक पर रख दिया हैं क्या यही नीतीश जी का रुल आंफ लां हैं।


नीतीश कुमार के चार वर्षो के कार्यकाल पर गौर करेगे तो इस तरह के गैर संवैधानिक कार्यो के दर्जनों दृष्टान मिल जायेगे।लेकिन सबसे दुखद पहलु यह हैं कि इस तरह के गैर संवैधानिक कार्य पर पूरा तंत्र खामोस हैं मीडिया तो नीतीश के यश गान में लगा हैं और यही हाल बिहार के बुद्धिजीवीओं का हैं और कोर्ट के बारे में टिप्पनी करना तो अवमानना माना जाता हैं लेकिन इनकी शैली भी अदभूत हैं।

लालू फिर से लौट के नही आ जाये इस भय ने पूरा बिहार को नपुसंक बना दिया हैं और नीतीश इसी भय को दिखाकर वह सब कुछ कर रहे हैं जो कभी राजा महराजा किया करते थे।अशोक चौधरी ने भी पद भार ग्रहन करते ही सरकार को खुश करने के लिए वह कदम उठाया हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र में हैं ही नही इन्होने सूचना के अधिकार के कानून में बदलाव कर दिया हैं जो देश की संसद ने बनायी थी।

रविवार, दिसंबर 20, 2009

निरंजन तिवारी के बहाने बिहार को समझने का मौंका मिला



बिहार की आठ करोड़ आवादी निरंजन की तरह सुबह जगने से लेकर रात के सोने तक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा हैं।लेकिन सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार की जड़े इतनी मजबूत हैं कि कोई इसके भेदने का साहस नही जुटा पा रही हैं,।स्थिति यह हैं कि अधिकांश मामलों में लोग या तो समझौता कर रहे हैं या फिर व्यवस्था में शामिल होकर भ्रष्टाचारियों की राह आसान कर रहे हैं।राजधानी के पत्रकारिता में निरंजन जैसे लोगो से मिलने का मौंका कम ही मिलता हैं।


संयोग से पिछले सोमवार को मुख्यमंत्री के जनता दरवार के कभरेज का मौंका मुझे मिला और इस बार के विषय में शिक्षा भी शामिल था।निरंजन तिवारी से जुड़ी हुई फाईले लेकर मैं सुबह सुबह जनता दरवार पहुचा।शिक्षा विभाग के तमाम आलाधिकारी के साथ साथ मंत्री ,गृह सचिव,निगरानी के एडीजीपी और पुलिस मुख्यालय के एडीजीपी,वी नरायनण मौंजूद थे।मेरे खुशी का ठिकाना नही था लगा कि आज तो निरंजन के लड़ाई का कोई न कोई हल सामने जरुर आयेगा।सबसे पहले मैं गृह सचिव अमीर सुहानी से मिला जरा अमीर सुहानी के बारे में याद ताजा कर ले ये पहले बिहारी हैं जिन्होने यूपीएससी की परीक्षा में पूरे भारत में टांप किये थे।मुझे भी याद हैं उस वक्त में सातवी वर्ग का छात्र था। स्कूल में बच्चों के बीच अमीर सुहानी के बारे में बताया गया था कि किस तरह एक मध्यमवर्ग के लड़के देश के सबसे बड़े इम्तिहान में प्रथम आया हैं।

इसकी प्ररेणा ने बिहार के युवकों में यूपीएससी को लेकर जो क्रेज पैंदा किया वह आज भी कायम हैं।लेकिन इससे मिलकर बड़ी निराशा हुई कहने वाले कहते हैं कि ये पांचों वक्त के नवाजी हैं और इसके इमानदारी की चर्चा आम हैं।जब इनसे निरजंन तिवारी के मामले में सूबे के सबसे बड़े अधिकारी प्रधान सचिव अनुप मुखर्जी के सीबीआई जांच से जुड़े हुए पत्र के बारे में जानना चाहा तो इनका कहना था हमारे पास ऐसे सैकड़ो पत्र आते रहते हैं जिसमें किसी ने थप्पर मारने की घटना का सीबीआई जांच कराना चाह रहे हैं तो कोई अपने पति के मामले में सीबीआई जांच कराना चाह रहे हैं।जब मैंने निरंजन के मामले की गहराही पर सवाल किया तो कहे ऐसे पत्र आते रहते हैं लेकिन जैसे ही मैंने थोड़ी उच्ची आवाज में बोला की इस मामले पर आज मुख्यमंत्री से सवाल करेगे तो आनन फानन में मुझसे फाईल झटक के पढने लगे।कहा मामला तो वाकई गम्भीर हैं चलो देखते हैं यह आपका अपना मामला हैं क्या मैंने कहा नही नही यह व्यक्ति अपनी व्यथा लेकर मुझसे मिलने आया था।जबाव सुनकर साहब जरा कुटील मुस्कान के सहारे कहा देखते हैं।मैने उनसे इस मामले में बाईट लेनी चाही तो कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।

अब मामले को लेकर राज्य के शिक्षा मंत्री के पास पहुंचा शिक्षा मंत्री हरीनरायण सिंह पूरे विभाग के साथ जनता के दरवार में बैंठे हुए थे।शिक्षा मंत्री को पूरे मामले के बारे में विस्तृत जानकारी दी इन्होने एक एक पत्र को पूरी गम्भीरता से पढा उन्होने कहा मामला वाकई गम्भीर हैं।बाजू में बैंठे शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव अंजनी सिंह से इन्होने कहा देखिये मामला तो वाकई में काफी गम्भीर हैं मंत्री लगातार बोलते रहे लेकिन प्रधान सचिव पूरी बात की अनसुनी करते रहे हार कर मंत्री ने बिहार विधालय समिति के सचिव अनुप कुमार को बुलाया और पूरे मामले की जांच करने का निर्देश दिया।अनुप कुमार साहब ने कहा कि जरा आप सारा पत्र का फोटो कांपी कराकर दे दे।अंदर ही अंदर मुझे गुस्सा भी आ रहा था ।मैंने डीपीआरओ को कहकर सारा फोटो कांपी करवाया और सचिव को दे दिया।तत्तकाल सचिव ने अपने कार्यलय में फोन करके सारे कागजात को निकलवाने का निर्देश दिया।बातचीत के दौरान इन्होने भी यह अहसास दिलाने से बाज नही आये कि आप इतने इन्ट्रेस्टेंट क्यों हैं सब कुछ मैं धेर्य से देखता और सूनता रहा।थोड़ी देर बाद जनता दरवार खत्म हो गया औऱ अब पत्रकारों के सवाल जबाव का सेशन शुरु हुआ।नेशनल मीडिया वाले तेलगंना मामले फिल्म पा और अल्पसंख्यकों के आरक्षंण से जुड़े सवालों का बोछार किये हुआ था क्यों कि उनके लिए बिहार की जनता की व्यथा का कोई मतलव नही हैं।रही बात अखवार वालों की तो उसके जुवान पर मैनेजमेंन्ट का ताला लगा हैं कोई ऐसा मसला नही उठाये जिनसे मुख्यमंत्री कि छवी पर कोई असर पड़े और इसका खामियाजा विज्ञापन पर पड़े।मैने निरंजन का मामला उठाया मुख्यमंत्री पूरे मामले को गम्भीरता से सुने और सूचना विभाग के प्रधानसचिव राजेश भूषण को बुलाया और कहा इनसे मिलकर पूरे मामले को देखे।मैं हतफ्रभ था मामला शिक्षा से जुड़ा हें और बात करने के ले सूचना विभाग के प्रधान सचिव को कह रहे हैं मैं फिर से सवाल दोहराया लेकिन मुख्यमंत्री साहब बीच में ही रोकते हुए कहा राजेश भूषण आपसे बात कर लगे।वार्ता खत्म होने के बाद मैंने देखा कि राजेश भूषण बिना कुछ बात किये हुए अपनी गाड़ी की तरफ बढ गये मैं तेजी से बढा और कहा कुछ बात करनी हैं पलट कर वे इस तरह देखे जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया।अब बात मेरी समक्ष में आयी कि मुख्यमंत्री ने राजेश भूषण को क्यो कहा,राजेश भूषण तय करते हैं कि किस चैनल को कितना विज्ञापन देना हैं और किस अखवार को कितना विज्ञापन देना हैं।खैर मैने हार नही मानी और जंग जारी रखने का फैसला लिया।

इस बीच बिहार विधालय समिति के सचिव जिन्हे जांच का जिम्मा सौंपा गया था उनसे मिलने के लिए बुधवार को उनके दफ्तर पहुंचा उसने मिलने से इनकार कर दिया मुझे लगा क्या बात हैं।मैं भी उनके चैम्बर के सामने डटा रहा थोड़ी देर बाद निकला और भागते हुए अपनी गाड़ी और बढा संतोष जी प्रधान सचिव के यहां बैंठक हैं बाद में मिलते हैं जाते जाते उनसे मैंने निरंजन मामले के बारे में जानकारी मांगी सभी फर्जी हैं और मैंने सभी शिक्षकों को बर्खास्त करने को लिख दिया हैं ।मैंने कहा खबर चला देते हैं कहा नही नही हम आपसे बात करते हैं।शाम में मिलते हैं लेकिन तीन दिनों तक वह मुझसे कटते रहे लेकिन शुक्रवार को मैं बोर्ड के दफ्तर में पहुंच कर जबरदस्ती मिला देखते हैं साहब निरंजन के मामले से जुड़ी फाईल लेकर बैंठे हैं।इन्होने कहा कि फर्जी सार्टीफिकेंट मामले से जुड़ी जांच रिपोर्ट बोर्ड से नही गयी हैं।किसी ने फर्जी सत्यापन पत्र पुलिस को भेजा हैं।सूचना के अधिकार के तहत दी गयी जानकारी सही हैं और सभी शिक्षक जो अभी भी कार्य कर रहे हैं उनकी ड्रिग्री पूरी तरह फर्जी हैं।मैने जांच रिपोर्ट सरकार को भेज दी हैं।थोड़ी राहत मिली चलो मामला एक कदम आगे तो बढा विधानसभा सत्र के कारण शिक्षा मंत्री से बात नही हो पायी हैं।अब आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि नीतीश के शासन में ब्यूरोक्रेसी कितनी निंरकुश हैं।(नोट-मामले से जुड़ी पूरी खबर-ये हैं मेरा बिहार,लेख में पढ सकते हैं)

मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

ये हैं मेरा बिहार



आज से करीब दस वर्ष पूर्व गांधीवादियों के एक सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला था। सम्मेलन में अधिकांश कांलेज के लड़के मौजूद थे।मंच पर गांधिवादियों का जमावरा लगा हुआ था और दर्शक दिर्घा में अधिकांश ऐसे युवक मौंजूद थे जिनके मन में गांधी के प्रति कोई आदर भाव नही था कार्यक्रम शुरु हुआ एक से एक वक्ता अपनी बात रख रहे थे।इसी दौरान एक व्यक्ति जिसकी उम्र 70वर्ष के करीब होगा अपनी बात रखने किसी तरह से मंच पर खड़े हुए जहां तक मुझे याद हैं वे दादा धर्माधिकारी थे और महाराष्ट्र से आने की बात कह रहे थे।भाषण की शुरुआत बिहार के पावन धरती को प्रणाम करने साथ हुआ। इन्होने कहा कि 1977के बाद बिहार आया हूं जब मैं अपने लोग से कहा कि मैं बिहार जा रहा हूं तो बहुत सारे मित्र मुझे स्टेशन तक छोड़ने आये,और कहा कि बिहार जा रहे हैं तो बिहारवालों को अवश्य बोलियेगा की पूरा देश उनसे एक और क्रांति की आस लगाये बैंठा हैं।भाषण का सिलसिल आगे बढा 70 वर्ष का वह व्यक्ति बोलते बोलते रोने लगा कहा बस अब आप से ही उम्मीद बची हैं सारा मुल्क आर्थिक उदारीकरण के सामने नस्तमस्तक हो गया हैं ।बहुराष्ट्रीय कम्पनी एक एक कर हमारे आर्थिक संरचना को धवस्त कर रहा हैं,एक बेवस और लाचार मराठी आपसे विनती करने आया हैं ।जागो और पूरे देश को जगाओं नही तो आने वाला कल बड़ी भवावह होगा। मैं इसी उम्मीद से बिहार आया हूं क्यों कि मुझे सभी बिहाररियों में गांधी, विनोवा और जेपी की प्रतिभा दिखती हैं।भाषण समाप्त होने के बाद सवाल जबाव का सत्र शुरु हुआ मैंने महाराष्ट्र से आये उस व्यक्ति से सीधा सवाल किया बिहार और बिहारियों में ऐसी कौन सी बात हैं जो पूरा देश क्रंति की उम्मीद लिए बैंठा हैं।उस वक्त इन्होने जो जबाव दिया था वह मुझे स्वीकार्य नही था। फिर भी मेरे जेहन में बिहार और बिहारियों के प्रति इस तरह के विचार रखने के पीछे के कारणों की तलाश छात्र जीवन से लेकर पत्रकारिता के आठ वर्षो के सफर तक सत्तत जारी रहा।कभी उम्मीद जगी भी लेकिन बाद मैं निराशा ही हाथ लगा। लेकिन कल जिस बिहारी से मिला उसकी बात सुनकर लगा कि आखिर बिहार का इतिहास इतना गौरवशाली क्यो रहा हैं और आज भी लोग बिहार से परिवर्तन की उम्मीद क्यों लगाये हुए हैं।

नाम निरंजन तिवारी पिता स्व-वीर तिवारी घर-धोकरहा,थाना मझौलिय,प0चम्पारण(बेतिया)के स्थायी निवासी हैं। अपने बड़े भाई के खिलाफ पिछले तीन वर्ष से धर्म युध लड़ रहा हैं अभी तक इस युध में उसे जलालत ही झेलनी पड़ी हैं ।लेकिन आज वे हमारे दफ्तर में न्याय के इस युध में मदद की गुहार लेकर आया हैं।मामला बिहार सरकार के सुशासन से जुड़ा हैं।

निरंजन दिल्ली में काम करता था छुट्टी में घर आया तो देखा कि उसके घर पर रात भर लोगो का आना जाना लगा रहता हैं।मालूम करने पर पता चला कि उसका बड़ा भाई राम जी तिवारी फर्जी डिग्री का कारोबार कर रहे हैं।बात 2007की हैं जब पूरे बिहार में प्राप्ताक के आधार पर शिक्षक की बहाली चल रहा था।राम जी तिवारी टिचर ट्रेनिंग से लेकर बोर्ड और संस्कृत बोर्ड का फर्जी सार्टीफिकेट बेचता था।घर में फर्जी सार्टीफिकेंट बनाने की फैक्ट्री चल रहा था पहले निरंजन ने अपने भाई को समझाया यह क्या कर रहे हैं यह देश के भविष्य के साथ खिलवार होगा ।लेकिन भाई के इस सलाह को गम्भीरता से नही लिया तब जाकर इस मामले की सूचना निरजंन ने बेतिया के तत्तकालिन डीएम और एसपी0 को दिया लेकिन कारवाई करना तो दूर उलटे निरंजन पर झूठा मुकदमा कर जेल भेज दिया।यह खेल वैसे एसपी के मिली भगत से किया गया जो बाहुबलि शहाबुदीन के घर पर पुलिस फोर्स ले जाने का साहस दिखाया था बच्चू सिंह मिणा जिनके बारे में बिहार में एक अलग छवि मानी जाती हैं।जेल से छुटने के बाद निरंजन फर्जी फर्जी सार्टिफिकेट रेकैट को उजागर करने की ठानी और पुलिस और प्रशासनिक विभाग के तमाम आलाधिकारी के दरवार में जा कर न्याय की गुहार लगायी लेकिन कोई कारवाई नही हुई अंत में पूरे साक्ष्य के साथ नीतीश कुमार के जनता दरवार में कई बार गया कारवाई नही होते देख एक दिन नीतीश के दरवार में जमकर हंगामा किया नीतीश कुमार खुद डीजीपी को छापामारी करने का निर्देश दिया जब छापामारी हुई तो राम जी तिवारी के घर से सैकड़ो जाली प्रमाण पत्र, मोहर बगैरह मिला ।बेतिया पुलिस प्रेस कान्फरेन्स कर एक बड़े रैकेट के भंडाफोर होने की बात कही लेकिन पुलिस का सुर कुछ ही दिनों में बदल गया और बीस दिनों के बाद कोर्ट से बेल भी मिल गया और बरामद सार्टीफिकेंट को सही लिखते हुए पुलिस ने केश को झुठा करार कर दिया और झुठा मुकदमा दर्ज करने का आरोप लगाते हुए निरंजन पर धारा 211के तहत कारवाई करने का आदेश तत्तकालीन एस0पी के0एस0अनुपम ने जारी किया।पुलिस ने मुकदमें के अनुसंधान के दौरान पांच लोगो का प्रमाण पत्र बिहार विधालय परीक्षा समिति और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविधालय वाराणसी जाकर जांच किया उपकुलसचिव के हस्ताक्षर से जांच कर्ता को पत्र दिया गया जिसमें राम तिवारी के घर से बरामद सभी प्रमाण पत्र को सही लिखा।लेकिन निरंजन तिवारी मानने को तैयार नही था इन्होने जांच में शामिल पांच लोगो के प्रमाण पत्र की सत्यता जानने के लिए सूचना के अधिकार के तहत बिहार विधालय परीक्षा समिति और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविधालय के सूचना पदाधिकारी से इन छात्रों के परीक्षा परीणाम के बारे में जानकारी मांगी।रिपोर्ट चौकाने वाला हैं सभी विधार्थी का प्रमाण पत्र फर्जी निकला जिसके बारे में पुलिस ने अपने अनुसंधान के दौरान कुल सचिव के पत्र के आधार पर सही लिखा था।यह सभी छात्र बेतिया में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं जिसमें राम तिवारी की बेटी,बेटा और पुतहु भी शामिल हैं।निरंजन की माने तो पूरे बिहार में इस तरह के फर्जी सार्टीफिकेंट के माध्यम से एक हजार से अधिक शिक्षक के पद पर कार्यरत और सैंकड़ो पंचायत सेवक, सेना और पुलिस में नौकरी कर रहा हैं।इस रैकेट के भंडाफोर होने से कई अधिकारियों का जेल जाना तय हैं इसलिए पूरी मशीनरी इस मामले को दवाने में लगा हैं।

मामला जो भी हो लेकिन निरजंन इसे उजागर करने को लेकर अभी भी व्यवस्था से लड़ रहा हैं और आज भी मुख्यमंत्री से लेकर तमाम प्रशासनिक अधिकारी के पास जाकर न्याय की गुहार लगा रहा हैं।जब मैंने पुछा ऐसे हलात में हिंसा का रास्ता क्यो नही अख्तियार किया जबाव हिंसा कायर कि निशानी हैं आज न कल न्याय जुरुर मिलेगा।रही बात सुशासन की तो आप समझ सकते हैं बिहार में सुशासन क्या हैं।फिर मेरा सवाल था नीतीश कुमार को वोट देगे कहां जरुर देगे लालू का राज्य रहता तो कब की मेरी हत्या हो गयी रहती कम से कम सच्चाई की लड़ाई लड़ने वाला अपनी बात तो कह पा रहा हैं.।इतने दिनों से मीडिया के पास क्यो नही जा रहे थे बड़ी जोर से हंसा कहा सर जी अखबार के दफ्तर में कागज देते देते थग गया लेकिन आज तक नही छापा मैने पुछा तो मेरे पास क्यों आये, उम्मीद हैं एक न एक दिन सत्य उजागर होगा और सत्य की जीत होगी । अगला सवाल था इस लड़ाई में आपकी नौकरी गयी कई कई दिनों तक बिना खाये रात में सोना पड़ा लोगो की जलालत झेलनी पड़ी जेल जाना पड़ा आखिर इस लड़ाई से आपको क्या बास्ता हैं। कहा सर जी बिहार के भविष्य का सवाल हैं।इसका जबाव सुनकर महसूस हुआ कि आखिर उस मराठी मानुष को बिहार के लोगो से इतनी उम्मीद क्यो थी।---------

शनिवार, नवंबर 28, 2009

नीतीश के बेचैनी का राज खुलने लगा हैं


नीतीश कुमार इन दिनों कुछ ज्यादा ही बैचेन दिख रहे हैं।हो भी क्यो न चुनावी साल हैं और विधान सभा उप चुनाव में मिली करारी हार से अभी भी उबर नही पाये हैं।फिर भी उनसे अलोकतांत्रिक व्यवहार की उम्मीद तो नही ही जा सकती हैं।लेकिन इन दिनों इन्होने कई ऐसे कदम उठाये हैं जो उनके लोकतात्रिक चरित्र से मेल नही खाता हैं।यह मेरे लिए भी खोज का विषय था कि आखिरकार नीतीश कुमार जैसे राजनेता जिसे देश का भावी नेता माना जाता हैं इस तरह का व्यवहार क्यों कर रहे हैं। सबसे बड़ा मसला सूचना के अधिकार कानून में संशोधन से जुड़ा हैं बिहार देश का पहला राज्य हैं जिन्होने सूचना के अधिकार पर कैंची चलायी हैं और इसे सीमित करने का प्रयास किया हैं।लेकिन दुर्भाग्य यह हैं कि इस मसले पर बिहार के बुद्धिजीवी और पत्रकार पूरी तौर पर खामोश हैं।इस संशोधन को लेकर ब्लांग पर जो लिखना था वह तो लिख कर मैंने अपनी भ्रास मिटाली। लेकिन यह सवाल मेरे जेहन में बार बार उठ रहा था कि आखिरकार नीतीश जी ऐसा क्यों किये।इस सवाल का हल ढूढने में लगा ही हुआ था कि एक दिन पूर्व विधायक उमाधर सिंह का फोन आया कहा हैं संतोष जी, सर पटना में ही हैं मैं भी पटना आया हूं और होटल गली में न्यू अमर होटल के कमरा नम्बर 16 में ठहरा हूं।कलम के इस शेर से मेरी बड़ी बनती थी लेकिन पटना आने के बाद बातचीत कम हो गयी थी।काम निपटा कर शीघ्र ही होटल पहुंचा बातचीत शुरु हुई तो पता चला कि सूचना आयोग के मुख्यआयुक्त इनसे मिलना चाहते हैं।बात शुरु हुई तो मेरे पेर के नीचे से जमीन खिसकने लगी और जिस सवाल का जवाव ढूढने को लेकर मेरी नींद हराम थी उस सवाल का हल मिलते दिखने लगा ।जैसे जैसे बात आगे बढती जा रही थी नीतीश में आये बदलाव का राज खुलता जा रहा था।


इन्होने योजना एवं विकास विभाग से नीतीश के कार्यकाल के दौरान हुए विकास और इकोनोमीग्रोथ के बारे में सूचना मांगा। लेकिन विभाग सूचना देने को लेकर टालमटोल करता रहा जब विभाग पर कारवाई की बात होने लगी तो विभाग ने वित्त विभाग के पास इनका आवेदन भेज दिया। वित्त विभाग भी इनके आवेदन पर टाल मटोल करता रहा लेकिन जब मामला अपीलीय कोर्ट में चला गया तो आनन फानन में वित्त विभाग ने इनके आवेदन को गैर सरकारी संगठन आद्री के पास भेज दिया ।और आग्रह किया कि इनके प्रश्न का जवाव दे दे।आद्री बिहार के आर्थिक बदलवा पर शोध करने वाली संस्था हैं और इन दिनों नीतीश चलीसा पढने में महारत हासिल किये हुए हैं।शैवाल गुप्ता इसके चीफ हैं,लेकिन सवाल का जवाब सूचना के अधिकार के तहत देना था तो इन्होने कानूनी पचरे में पड़ने के बजाय पूरी सूचना मुहैया करा दिया।सूचना काफी चौकाने वाली और विकास पुरुष नीतीश कुमार की कलई खोलने वाली थी।जरा आप भी रिपोर्ट को देखे---------

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य हैं और यहां की 90 प्रतिशत अबादी कृषि पर आधारित हैं लेकिन कृषि के क्षेत्र में विकास दर दिन प्रतिदिन कम होती जा रही हैं।

वर्ष-2004—2005—4.47प्रतिशत इकोनोमी ग्रोथ कृषि के क्षेत्र में था।

वर्ष-2005-2006—3.66प्रतिशत इकोनोमी ग्रोथ कृषि के क्षेत्र में था।

वर्ष 2006—2007—1.62प्रतिशत इकोनोमी ग्रोथ कृषि के क्षेत्र में

इस तरह यह आंकड़ा बता रहा हैं कि बिहार में कैसा विकास हो रहा हैं।इसी तरह अर्थशास्त्र के द्वितीय सेक्टर उधोग के ग्रोथ का भी यही हाल हैं हलाकि आकड़े की माने तो ग्रोथ 4.06प्रतिशत से बढकर 11.13दिखाया गया हैं। लेकिन आकड़ो में बढोतरी के बारे में लिखा हैं उसमें उधोग के विकास के बारे में कुछ भी जानकारी नही दी गयी हैं।खुद आद्री ने लिखा हैं कि यह बढोतरी शहरों में भवनों निर्माण में तेजी आने के कारण हुई हैं।वही तीसरे सेक्टर में टेलीकोमनिकेशन, बैंकिग और ट्रान्सपोर्ट के क्षेत्र में .10प्रतिशत की बढोत्तरी दिखायी गयी हैं।अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की माने तो यह ग्रोथ काले धन के फ्लो को दिखा रहा हैं। यह रिपोर्ट सरकार के तमाम रिपोर्ट कार्ड के दावे की कलई खोल कर रख दी हैं।अब मेरे समझ में आया कि नीतीश सूचना के अधिकार पर कैंची क्यों चलाये।बातचीत आगे बढी तो नीतीश से रही सही उम्मीद पर भी ग्रहन लग गया।योजना मद से जुड़े सूचना में सरकार की मशीनरी तो हद कर दी हैं।बिहार सरकार ने जो केन्द्र सरकार को लेखा जोखा भेजा या फिर विधानसभा के पटल पर जो लेखा जोखा रखा और सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी दी गयी तीनों अलग अलग हैं।उमाधर सिंह ने सूचना आयुक्त से पूछा हैं कि आखिरकार इन तीनों सूचना में कौन सी सूचना सही हैं ।इसी मसले पर बातचीत करने के लिए मुख्यसूचना आयुक्त इन्हे मिलने के लिए बुलाया था।मामला आगे न बढे इसको लेकर कई तरह का आफंर उमाधार सिंह को दी जा रही हैं।अब आप समझ सकते हैं कि बिहार की जनता को आकड़ों के सहारे किस तरह छला जा रहा हैं।बातचीत आगे बढी तो मीडिया के नीतीश परस्त होने का भी राज खुल गया हैं।इन्होने सूचना के अधिकार के तहत मांगा कि मीडिया को पिछले तीन वर्षों के दौरान किनता विज्ञापन सरकार की और से मिला हैं आकड़े चौकाने वाले हैं।पचास करोड़ प्रिट मीडिया को और तीन करोड़ रुपया का विज्ञापन इल्कट्रानिक मीडिया जो दिया गया हैं।विज्ञापन के अन्य माध्यमों को जोड़ दे तो लगभग सौं करोड़ खर्च सिर्फ सरकार के उपलब्धियों के प्रचार प्रसार पर किये गये हैं।अब आप ही बताये जिस प्रदेश की आधी से अधिक आबादी की औसत आमदानी रोजाना बीस रुपया से कम हैं वहां सरकार प्रचार प्रसार पर सौ करोड़ रुपये खर्च करती हैं।यही नीतीश के विकास का सच हैं जिसके सहारे दूसरी बार सत्ता में आना चाह रहे हैं।

मंगलवार, नवंबर 24, 2009

नीतीश ने पूरे किये चार वर्ष


आज पूरे बिहार में सीएम सचिवालय से लेकर डीएम सचिवालय तक उत्सव का महौल का था एक से एक लजीज पकवान मेज पर सजाये गये थे।कहते हैं कि इस उत्वस को सफल बनाने के लिए सरकार ने अपनी तिजौंरी खोल रखी थी।अखबार वालों को पचास लाख से एक करोड़ तक का विज्ञापन दिया गया हैं। अखबार वालों ने भी कोई कसर नही छोड़ी थी लग रहा था बिहार के आजादी का उत्सव मनाया जा रहा हैं।एक से एक विचारक, अर्थशास्त्री, और विशेषज्ञों की राय से पूरा अखबार पटा था।नीतीश को महिमामंडित करने में कोई कसर नही रह जाये इसके लिए चीफ रिपोर्टर से लेकर संपादक तक पूरी रात नीतीश चलीसा गढने मैं लगे रहे ऐसा सुबह सुबह अखबार पढने से लग रहा था ।होना भी चाहिए था क्यों कि आज नीतीश सरकार के कार्यकाल का चार वर्ष पूरा हुआ हैं।इस अवसर को भूनाने के लिए सीएम सचिवालय से लेकर डीएम सचिवालय पिछले दो माह से रात दिन एक किये हुए था।उपलब्धि का आकड़ा छूट न जाये इसके लिए विशेषज्ञों की पूरी फौंज लगायी गयी थी।रिपोर्ट कार्ड आने के बाद लगा की वाकय तैयारी पुलफ्रुफ था कार्ड देखने से लग रहा हैं कि इस सरकार की आलोचना करना सूर्य को दिपक दिखाने जैसा हैं।                       लेकिन इस उत्वस के बीच लोगो की राय जानने का जिम्मा आज मुझे मिला था।पटना के सड़कों पर पूरे दिन नीतीश सरकार के जनविरोधी नीति का हवाला देकर भाकपा माले का आन्दोलन जारी रहा। लेकिन बिहार में पहली बार यह देखने को मिला कि जनसरोकार की बात करने वाले भाकपा माले के आन्दोलन में कोई धार नही दिखाई दे रहा था।मुजफ्फरपुर,गया जैसे शहरों में दुकानदारों ने बंद करने से इनकार कर दिया और लोगो ने बंद समर्थकों को पीटा भी।वही दूसरी और लोक उपक्रम से जुड़े हजारों कर्मचारी वर्षों से बंद वेतन के भुकतान की मांग को लेकर अर्द्धनग्न प्रदर्शन किया और सरकार के रिपोर्ट कार्ड को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह सरकार ब्यूरोक्रेट के हाथों की कटपूतली बन कर रह गया।पटना के वीमेंन्स कांलेज की छात्राओं ने नीतीश के सुशासन के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अभी भी महिलाये राजधानी पटना में सुरक्षित महसूस नही कर रही हैं।कही किसी ने बटाईदारी कानून की बात कर नीतीश सरकार को कटघरे में खड़े करने का प्रयास किया वही एक युवक ने कहा कि विकास का क्या मतलव हैं बेली रोड सड़क बनाने से विकास होता हैं इनके कार्यकाल में रोजगार के अवसर में कमी आयी हैं एक परीक्षा पास भी किये हैं तो लगता हैं बांस घाट(शमशान घाट)पर ही नियुक्ति पत्र मिलेगा। एक किसान खाद और बीज के लिए गांव से पटना आया था उसकी प्रतिक्रिया सहज और क़टु था किसान को सरकार से क्या चाहिए सरकार खाद और बीज भी मुहैया नही करा पाती हैं तो फिर सरकार क्या कर सकती हैं। सरकार फिलगुड महसूस कर रही हैं।एक रिक्शा चालक ने यहां तक कह डाला कि दिन पर कमाई करते हैं लेकिन परिवार को साथ रखने के लायक आमदनी नही होती हैं महंगाई इतनी बढ गयी हैं । हलाकि नीतीश सरकार को लेकर इस तरह की प्रतिक्रिया दवी जुबान ही सुनने को मिली लेकिन इतना तो जरुर दिखा कि नीतीश कुमार का हाल कही चन्द्र बावू नायडू वाला न हो जाये।क्यों कि नीतीश के फिलगुड,अपराध नियत्रण,विकास और सुशासन से सूबे की 90प्रतिशत जनता महरुम हैं।गांव में आज भी विकास की रोशनी दूर दूर तक दिखाई नही दे रही हैं वही भ्रष्टाचार की आंच मुखिया और पंचायत सचिव के माध्यम से गांव गांव तक पहुंच गया हैं।शिक्षक वहाली और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले को दी जाने वाली राशन किरासन में लूट को रोकने में सरकार की मशीनरी पूरी तरह फैल कर गयी हैं।नरेगा के नाम पर लूट मची हैं और एक बार फिर से मजदूरों का पलायन तेज हो गया हैं।                                                                                लेकिन सरकार और राजधानी में बैंठे बुद्दि विलास करने वालो को लिए यह कोई सवाल नही हैं।खैर मुझे भी इस सवाल से कोई खास वास्ता नही हैं लेकिन दुख हैं कि कही नीतीश कुमार का राजनैतिक कैरियर चन्दबाबू नायडू की तरह ध्वस्त न हो जाये। लेकिन इन सब के बीच जिस तरह से पत्रकारों ने अपनी कलम गिरवी लगा रखी हैं उसका क्या हर्ष होगा यह सोचकर रुह कांप जाती हैं।