रविवार, अप्रैल 18, 2010

ऐसा टकसाल नही बना हैं जो नीतीश को खरीद सके


पहली बार शराब घोटाले मामले में जब मुख्यमंत्री सचिवालय पर करोड़ो के घोटाले का आरोप लगा था, तो नीतीश कुमार ने बड़ी बेवाकी से कहा था कि कोई ऐसा टकसाल नही बना हैं जो नीतीश को खरीद सके।आवाज में दभ था और एक संदेश भी की कोई मुख्यमंत्री पर पैसे लेने का आरोप लगाने का दुसाहस नही करे।मेरा भी मानना हैं कि राजनैतिक मजबूरियो के कारण पैसे के लेन देन की जानकारी के बावजूद नीतीश चुप रह जाते हो लेकिन इस विचारधार के हैं नही।मीडिया में रहने के कारण अक्सर तबादले और विकास कार्य के माध्यम से धन की उगाही की बात सुनते रहते हैं। लेकिन दो वाकया ने तो मेरी नींद हराम कर दी।पिछले सोमवार को रात के करीब 12 बजे मोबाईल की घंटी बजी।


इतनी रात गये पत्रकारो के मोबाईल की घंटी बचना कभी भी शुभ संदेश लेकर नही आता हैं।मंगलवार को मोरनिंग सिप्त रहने के कारण मैं जरा जल्दी सो गया था।लेकिन जैसे ही मोबाईल की घंटी बजी मोबाईल उठा लिया और बोला क्या सर इतनी रात गये फोन कर रहे हैं सब ठिक ठाक हैं कि नही।

संतोष जी दो बड़ी खबर हैं विनोवा भावे विश्वविधालय के कुलपति अरविन्द कुमार मगघ विश्वविधालय बोधगया का कुलपति बन गया हैं।झारखंड में इसके खिलाफ करोड़ो रुपये घोटाले के चालीस मामले की जांच चल रही हैं और यह बहुत जल्दी पकड़ाने वाला था मैंने पुछे ऐसे दागी लोगो को कैसे कुलपति बनाया गया हैं।राज्यपाल एक करोड़ रुपया लिया हैं।दूसरी खबर हैं कि एसपी अमीत जैन जिसके बारे में आप खबर दिखाये थे कि कटिहार एसपी के कार्यकाल के दौरान इन्होने सिपाही बहाली में करोड़ो रुपये की उगाही किया थी और राज्य सरकार द्वारा गठित टीम ने भी इसे दोषी करार दे दिया था।उसे पटना का सीनियर एसपी बनाया जा रहा हैं।आरसीपी(मुख्यमंत्री के निजी सैक्ट्री हैं)को 25लाख रुपया दिया हैं।मैने उनसे पुछा नोटिफिकेशन हो गया कि नही एक दो दिन में हो जायेगा।मैंने कहा इतनी रात गये आप इस तरह की खबर दे रहे हैं नीतीश कुमार इस मामले में बड़ी सावधानी से कदम बढाता हैं इतना कच्चा खेलाड़ी नही हैं।कह कर मैं फिर सो गया,सूबह जब आफिस पहुचा तो रात वाली बात याद आयी मैने तुरंत मुख्यमंत्री के सुरक्षा से जुड़े एक आलाधिकारी को फोन किया सर ऐसी बाते सामने आ रही हैं।जरा इस पर नजर रखियेगा । मुझे भी विश्वास नही हो रहा हैं लेकिन ऐसा हुआ तो सरकार की बड़ी बदनामी होगी।बात आयी औऱ चली गयी।

अचानक शुक्रवार की सुबह अखबार के प्रथम पेज पर छपा हैं अरविन्द कुमार मगघ विश्वविधालय के कुलपति बने, मेरा दिमाग चकरा गया मैंने तुरंत उस व्यक्ति को फोन लगाया जिसने यह सूचना दी थी।जैसे ही मोबाईल उठाया बोला संतोष जी कह रहे थे ने आपको बन गया न हिन्दुस्तान टाईम्स पढिए सारा चिठ्ठा कठ्ठा लिखा हैं।बात खत्म होते ही मैने मुख्यमंत्री सुरक्षा से जुड़े उस आलाधिकारी को फोन लगाया उस तरफ से आवाज आती हैं सीएम के साथ हैं।लगभग दो घंटे बाद उक्त आलाधिकारी का फोन आया मैने कहा सर देखे अरविन्द कुमार कुलपति बन गया मैने कहा अब आगे अमित जैन पटना का सीनियर एएसपी न बन जाये।उन्होने कहा संतोष जी मेरा विश्वास हिल गया हैं अब कुछ भी हो सकता हैं।आप उसी दिन साले का खबर चला देते मैंने कहा सर प्रिंट मीडिया नही हैं भिजुउल मीडिया में यह सब सम्भव नही हैं।

बात गयी बीत गयी उसी दिन शुक्रवार की रात करीब 10बजे एक डीआईजी का फोन आया संतोष जी कहा हैं मैने बोला सर जी घर पर हैं पता लगाईए बड़े पैमाने पर आईपीएस अधिकारियो का तबादला हो रहा हैं।मैंने मुख से अचानक निकल गया कि अमित जैन पटना का सीनियर एसपी बना होगा।उन्होने पुछा यह आप कैसे कह रहे हैं।थोड़ी देर बाद चैनलो पर खबर भी आने लगी बड़े पैमाने पर आईपीएस अधिकारियो का तबादला।सूची मिलने में लगभग एक घंटे चालीस मिनट का समय लग गया जैसे ही सूची मिली सबसे पहले पटना के एसएसपी के पद पर हुई नियुक्ति की तरफ नजर दौड़ाया अमित जैन पटना का सीनियर एसएसपी बना।हो सकता हैं उस साहब की बातो में दम न हो । लेकिन कुलपति और एसएसपी की नियुक्ति को लेकर इस तरह की चर्चाये होनी भी बड़ी बात हैं।क्यो कि दोनो पद अपने अपने जगहो पर बेहद महत्वपूर्ण हैं और प्रदेश के क्षवि को रिप्रजेन्ट करता हैं।

लेकिन मेरी समझ में यह नही आ रहा हैं कि नीतीश कुमार जैसे मुख्यमंत्री को ऐसी क्या मजबूरी हो सकती हैं कि जिन पर पूर्व से ही भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हो और उन पर जांच चल रही ऐसे लोगो को महत्वपूर्ण पदो पर नियुक्त करे।

बिहार ही नही पूरे देश में विकास से बड़ा मुद्दा भ्रष्टारचार हैं और आज देश में जो भी समस्याये खड़ी हैं उसके पीछे भ्रष्टारचार हैं और मुझे लगता हैं कि इस देश को एक बार फिर भ्रष्टाचार के कारण ही अपनी अस्मिता खोनी न पड़ सकती हैं।

रविवार, अप्रैल 11, 2010

माओवादियो से जुझता हिन्दुस्तान

केन्द्र सरकार के आकड़ो की माने तो देश की 40 प्रतिशत जिलो पर माओवादियो की समान्तर सरकारे चलती हैं जिसमें बिहार के 38 जिलो में से 26जिले माओवादियो के गिरफ्त में हैं।यह आकड़ा राज्य सरकार के बेवसाईट पर उपलब्ध हैं। नीतीश कुमार के कार्यकाल में सौ से अधिक नक्सली घटनाये हो चुकी हैं जिसमें दर्जनो लोगो की मौंत हुई हैं और कई पुलिस वाले मारे जा चुके हैं दर्जनो बार पुलिस थाने पर हमले हुए हैं और काफी मात्रा में आर्मस की लूट हुई हैं।लेकिन नीतीश कुमार दिल्ली में महिला पत्रकारो के बीच जिस तरीके से गृह मंत्री पी चिदंबरम पर कटांक्ष किये और पत्रकारो ने ठहाके लगाकर नीतीश कुमार के दलील का समर्थन किया।यह बेहद शर्मनाक हैं।एक व्यक्ति जो देश के काउज को लेकर गम्भीर हैं उसके प्रति इस तरह का खलाय रखना वाकई शर्मसार करने वाली बात हें।


नीतीश कुमार कहते हैं कि नक्सलवाद का हल हथियार या स्टेट पावर से नही निकल सकता हैं जब तक विकास की धारा अंतिम व्यक्ति तक नही पहुच जाता ।अच्छी बात हैं इस बयान से ऐसी मैं बैंठकर गरीबी मिटाने के नाम पर बड़ी बड़ी बात करने वाले बुद्धिजीवी को नीतीश कुमार के बयान से बल मिला होगा। पिछले आठ माह में बिहार में नक्सलियो ने दो बड़े नरसंघार को अंजाम दिया हैं जिसमें चालिस से अधिक लोगो की मौंत हुई हैं।एक घटना खगड़िया जिले के अमौसी गांव में हुआ जहां नीतीश कुमार के विरादरी के 18लोगो की हत्या महादलित मुसहर जाति के लोगो ने किया था।वाकय जिस इलाके में यह घटना घटी हैं वहां विकास नही हुआ हैं लेकिन इस घटना के पीछे का कारण यह था कि वर्षो से जमीन को लेकर इन क्षेत्रो में संघर्ष चल रहा हैं। पिछली सरकार हो या फिर नीतीश कुमार के चार वर्षो का कार्यकाल हो कभी किसी ने इस क्षेत्र मे वर्षो से जारी संघर्ष को रोकने पर पहल नही किया।लेकिन हत्या विरादरी के लोगो का हुआ तो नीतीश कुमार ने भी पुलिस बल के सहारे इन इलाको में रहने वाले मुसहर जाति के एक एक गांव को रौद दिया ।सौ से अधिक लोग गिरफ्तार हुए हैं और एक एक कर मुसहर जाति के युवको को मारा जा रहा हैं।लेकिन जिस कारण से यह नरसंघार हुआ उस कारण के समाधान के लिए सरकार ने कोई पहल नही किया।

दूसरी घटना जमुई जिले की हैं जहां के नक्सली नेता नीतीश कुमार के विरादरी के हैं या फिर पिछड़ी जाति के लोग हैं।नक्सलियो ने पहाड़ पर स्थिति आदीवासी गांव पर हमला बोलकर 15लोगो की हत्या कर दी।इन गांव वालो ने नक्सली के सामने अपने बहु बेटी को भेजने से मना कर दिया।लेकिन ये आदिवासी आज की राजनीति में वोट बैंक नही हैं इस लिए नीतीश जी इस घटना पर अफसोस भी जाहिऱ नही किये।आज भी उन इलाको में बसे आदिवासी नक्सलियो से लोहा से रहे हैं और पिछले दिनो छह नक्सलियो को तीर धनुश से घायल कर जिंदा जला दिया।

यह दो घटनाये महान विचारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दोहरे चरित्र को समझने के लिए काफी हैं।और तीसरी जो सबसे बड़ी बात हैं वह हैं बिहार के अधिकांश नक्सली संगठन को कही न कही सरकार का समर्थन मिल रहा हैं मुख्यमंत्री के पार्टी के बड़े नेता और विधानसभा के अध्यक्ष पर नक्सली से सांठगांठ के कई बार आरोप भी लग चुके हैं।यही स्थिति झारखंड का हैं जहां के मुख्यमंत्री शिबु सोरेन पर नक्सलियो के मदद से चुनाव जीतने के आरोप लगते रहे हैं।यह दोनो राज्य ऐसा हैं जहां के मुख्यमंत्री अप्रेशन ग्रीन हंट का खुलकर विरोध कर रहे हैं।

यह तो वक्तिगत मामला हो गया लेकिन इस मसले पर देश के लोग क्या सोचते हैं उसपर भी बहस होनी चाहिए पत्रकारिता के दौरान मुझे कई बार नक्सली नेताओ और उसके समर्थको से मिलने का मौंका मिला हैं।मेरा मानना हैं कि नक्सली संगठन भी अपराधियो का एक संगठित गिरोह हैं जो गरीबी मिटाने और शोषण के खिलाफ आर्मस के माध्यम से क्रांति लाने की बात करते हैं।उनका चरित्र और आचरण दाउद,भिडरावाला और अलकायदा से कही भी अलग नही हैं।मुझे यह समझ में नही आता हैं कि लोग कहते हैं या यू कहे सरकार और सेना अध्यक्ष भी कहते हैं कि नक्सली भी देश का नागरिक हैं इस पर हवाई हमला कैसे किया जाये या फिर सेना का उपयोग नही होनी चाहिए।मैं पुछना चाहता हू कि खालिस्तान के समर्थन क्या विदेशी थे।काश्मीर या फिर उत्तरपूर्व में जो हिंसक आदोलन हो रहे हैं वै सभी विदेशी हैं क्या।नक्सली भी वही कर रहे हैं जो अलकायदा या आतंकवादी इस देश में करना चाहते हैं।

नक्सली क्या कर रहे हैं अपनी बात को जनता के बीच रखे या फिर मीडिया के सामने लाये और देश स्तर पर बहस हो, लेकिन ये लोग यह नही चाहते हैं अभी क्या हो रहा हैं, नक्सली इलाको में सड़क बनाने वाली कम्पनी अच्छी सड़के बनाये इसके लिए नकसली तोड़ फोड़ नही करते हैं ।तोड़ फोड़ या फिर कम्पनी के लोगो का अपहरण इसलिए करता हैं कि उन्हे लेवी में बड़ी राशी मिले। गरीबो को समय पर राशन मिले, नरेगा के तहत काम मिले गरीबी मिटाने को लेकर जो योजनाये चल रही हैं उससे गरीबो को लाभ मिले इसके लिए नक्सली नेता हिसंक घटनाओ को अंजाम नही देते हैं उन्हे तो बस लेवी चाहिए जो पदाधिकारी गरीबो का राशन बेचकर लेवी दे, जो अधिकारी फायल में ही सड़क बना दे, जो अधिकारी नरेगा का पैसा आपस में बाट ले वैसे अधिकारी नक्सली के सबसे करीबी हैं।कहने का मतलब यह हैं कि ये भी गरीबो के हकमारी करके ही अपना संगठन चला रहे हैं।इन दिनो बिहार में सौ से अधिक सरकारी स्कूलो को नक्सली संगठनो ने डाईनामाईट से उड़ा दिया हैं।इसका कोई मतलव हैं क्या।जमशेदपुर में जिस बीडीओ का अपहरण किया गया था उस बीडीओ ने नरेगा के कार्य के माध्यम से गरीब आदिवासी को रोजगार मुहैया कराने को लेकर जंगल में आदिवासीयो के साथ बैंठक कर रहा था।और उसी बीच से नक्सलीयो ने उसे उठाकर ले गये इसलिए कि बीडियो विकास की राशी को बांटने के बजाय आदिवासियो के लिए काम करना चाहता था।ऐसे एक नही हजारो उदाहरण हैं महास्वेता देवी जैसे लोगो को यही समझने की जरुरत हैं नक्सली भी वही कर रहे हैं जो पहले अंग्रेज करते थे या फिर उन इलाके के जमीनदार करते थे।

दिल्ली और बड़े शहरो में रहने वाले ऐसे लोग जो नक्सलियो को गरीबो का हिमायती मानते हुए नैतिंक समर्थन दे रहे हैं ।उनकी जानकारी के लिए बिहार और झारखंड के उन इलाको में सरकारी अधिकारी खासकर बीडियो और डीएम जो विकास कार्य से जुड़े हैं वे उन इलाको में मोटी रकम देकर अपना पोस्टिंग कराते हैं, ताकि नक्सलियो से मिलकर गरीबी के विकास की राशी को लूट सके।

रविवार, मार्च 21, 2010

नीतीश कुमार के सफर का एक सच यह भी हैं।



नीतीश कुमार के कार्यशैली को लेकर इन दिनो ब्लांग पर जबरदस्त बहस छिड़ी हैं।इस बहस को रवीश जी के बिहार दौड़े ने और हवा दे दी हैं।पहली बार दोनो पंक्ष काफी मजबूती से अपनी बातो को रख रहे हैं।मैं तो नीतीश की कार्यशैली पर सवाल खड़े किये जाने को लेकर ही जाना जाता हूं ।लेकिन इसकी जो वजह हैं उससे लोग रुबरु होना नही चाहते हैं।मेरा मानना हैं कि आज की तारीख में नीतीश देश के सबसे प्रतिभावान राजनेता हैं।विकास के प्रति संवेदनशील हैं और बिहार जैसे प्रदेशो में जहां की राजनीत जातिये गोलबंदी पर आधारित हैं उसको पहली बार नीतीश कुमार ने पूरी तौर पर तोड़ दिया हैं।यही बजह हैं कि आज नीतीश कुमार के घोर विरोधी भी उनके खिलाफ कोई माहौल नही बना पा रहे हैं।


नीतीश कुमार बिहार के विकास के मुद्दे को लेकर चुनावी मैंदान में आये थे, लोगो ने इनकी भावनाओ का सम्मान भी किया और इन्हे पूर्ण बहुमत के साथ बिहार की गद्दी पर बैंठाया भी।

नीतीश कुमार के जीत में सूबे के आम और खास दोनो वर्गो के लोगो का जबरदस्त योगदान रहा हैं। एक और जहां बिहार के आम लोग जातिये समीकरण को नजर अंदाज कर लालू जैसे नेता को दरकिनार कर दिया।

वही खास लोगो ने लालू के खिलाफ पूरे सूबे में ऐसा माहौल बनाया कि बिहार में वाकई जगल राज हैं।मैं इस बहस में नही पड़ना चाहता क्यों कि नीतीश कुमार आज वाकई खास लोगो के दिल में पूरी तौर पर जगह बना लिया हैं।ये वही खास लोग हैं जिनकी पकड़ मीडिया और ब्यूरोक्रेसी के साथ साथ व्यवसाय पर हैं जो बिहार के कुल आबादी के पाच फिसदी भी नही हैं।खास लोगो में दूसरा वर्ग जो काफी संख्या में हैं और उसके आवाज में दम भी हैं ।

वे हैं बिहार के मीडिल क्लास जिसकी सोच, मैं और मेरा परिवार तक सीमित हैं।नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान दोनो वर्ग के लोग काफी कमफोरटेबल महसूस कर रहे हैं। लोगो को क्या चाहिए पैसे कमाने की आजादी और उसके खर्च करने की व्यवस्था। नीतीश कुमार इस पर पूरी तरह से खड़े उतरे हैं ,आज आप पटना पहुंचे और एक माह बाद फिर से पटना आये काफी फर्क नजर आयेगा। वह सारी व्यवस्था आज पटना में उपलब्ध हैं जिसकी चाहत में लोग दिल्ली मुबई जाते हैं।एक से एक रेस्टरा आज पटना में मौंजूद हैं जहा आप देर रात तक मचा उठा सकते हैं।शहर की कौन कहे छोटे छोटे कस्बो में भी हेमामालिन के गाल से भी चिकना सड़क आपको मिल जायेगा भले ही उन सड़को पर बैलगाड़ी ही दौड़ता क्यो न मिल जाये।आज पटना में स्थिति यह हैं कि यहां की जमीन औऱ एपार्टमैंन्ट की कमित एनसीआर से भी अधिक हो गयी हैं।जिस एपार्टमेंन्ट की किमत पिछले वर्ष 9लाख था आज 18लाख में खरीदने वालो की लाईन लगी हुई हैं।

दफ्तर जाने के समय आप सड़को पर खड़े हो जाये तो दिल्ली सा नजारा देखने को मिल जायेगा।महिलाओ और लड़किया फोरविलर और एसक्यटी से दफ्तर जाते मिल जायेगी जो पांच वर्ष पहले सोच भी नही सकती था।पटना में इन्सुरेन्स, मोबाईल के साथ साथ बैकिंग क्षेत्र से जुड़ी अधिकांश कम्पनियो का दफ्तर खुल गया हैं। दफ्तर में चले जाये आपको लगेगा ही नही की यह वही बिहार हैं।लगभग बिहार के अधिकांश छोटे और मझौले शहर की यही स्थिति हैं।इस स्थिति तक पहुचाने में नीतीश कुमार की सबसे अहम भूमिका हैं।लेकिन मैं जिस फिल्ड का उदाहरण दे रहा हूं उस फिल्ड से बिहार की पांच फिसद आबादी भी नही जुड़ा हैं ।लेकिन इसके आवाज में इतना दम हैं कि पूरे भारत में लग रहा हैं की वाकई बिहार बदल गया हैं।हो भी क्यो न बिहार ही नही पूरे देश में विकास का पैमाना ही यही हैं।

लेकिन बिहार के तस्वीर का दूसरा पहलु भी हैं जो आबादी के अस्सी फिस्दी हैं, लेकिन उसके जुबान में आवाज नही हैं, उसके आवाज से किसी की हमदर्दी नही हैं, मीडिया के लिए वह कोई खबर नही हैं।लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बदलने की ताकत उसी के पास हैं।जिस पांच से दस फिसदी को सामने रख कर नीतीश कुमार विकास के ढोल पीट रहे हैं वह दस फिसदी आवादी चुनाव के दिन बीवी और बच्चो के साथ अपने बेंडरुम में आराम फरमाते रहेगे। मेरी लड़ाई इन्ही दस फिसदी लोगो से हैं जो स्टेट के रिसोर्सेज का अधिक से अधिक उपयोग करते हैं लेकिन जब स्टेट की बात आती हैं तो इनकी सोच , मैं और मेरे परिवार तक सिमट कर रह जाती हैं।

आज पूरे सूबे का किसान बेहाल हैं बड़ी मेहतन से आलू और मकई की खेती किया मौंसम के साथ नही मिलने के बावजूद खून पिसान एक करके किसानों ने जबरदस्त पैंदावार किया लेकिन आज आलू खरीदने वाला कोई नही हैं जिसकी कमित दो माह पूर्व बीस रुपये किलो था आज किसान एक रुपये किलो पर भी बेचने को तैयार हैं लेकिन कोई खरीदार नही हैं जिसके कारण किसानों का आलू खेत मैं सर रहा हैं।वही मकई की खेती करने वाले किसानो का हाल तो और बूरा हैं।इस बार जो बीज किसानो को सरकार और निजी कम्पनियो ने मुहैया करया हैं उसमें खेत में मकई की फसले तो लहलहा रही हैं लेकिन मक्के में दाना नही हैं।पहली बार बिहार में किसानो ने फसल का हाल देखकर आत्महत्या किया हैं हलाकि पूरी मशीनरी उस किसान के आत्महत्या को परिवारिक विवाद ठहराने में जुटा हैं।

मेरा विरोध का कारण यही हैं आज राजधानी पटना को छोड़कर पूरे बिहार में कही भी दो घंटे से अधिक बिजली नही रहती हैं।यू कहे तो बिहार में विकास के नाम पर लूट मची हैं।पदाधिकारी और ठिकेदार मालोमाल हो रहे हैं और आम लोग दो वक्त की रोटी के लिए मुबई और दिल्ली की सड़के पर रेग रहे हैं।

आज सूबे की पूरी मशीनरी बिहार दिवस मनाने में लगा हैं पहली बार बिहार बंगाल से अलग होने की तारीख 22मार्च को बिहार स्थापना दिवस के रुप में मनाने का फैसला लिया हैं।सूबे में ही नही देश औऱ विदेश में जहां कही भी बिहारी हैं उनसे राज्य सरकार ने अपील किया हैं कि बिहार दिवस के अवसर पर कार्यक्रम करे।इसके लिए राज्य सरकार मदद करने की भी पेशकश की हैं। अच्छी पहल हैं इससे लोगो में बिहार के प्रति जो भावना पाल रखा हैं उसमें भी बदलाउ आयेगा और बिहारियो को बिहारी होने का एहसास भी होगा।समाज को जोड़ने और साथ लाने का यह एक आधुनिक तरीका हैं लेकिन जिस सूबे की अस्सी फिसद आबादी की रोज की आमदनी बीस रुपये हैं।उसके लिए बिहार दिवस का कोई माईने हैं क्या प्रदेश की 38में 26जिले नक्सल प्रभावित हो गये हैं और इन इलाको में सरकार की पकड़ धीरे धीरे कमजोर होती जा रही हैं।ऐसे हलात में नीतीश कुमार के सुशासन के दावे का कोई मतलव हैं तो मैं भी नीतीश चलीसा पढने को तैयार हूं।

रविवार, मार्च 14, 2010

इस जहा मैं मनुवादी कौन हैं

वेद में देवता और दानव के बीच कई युद्धो की चर्चा मिलती हैं।जिसमें संख्या बल के बावजूद दानव की हमेशा हार होती हैं।इस युद्द को लेकर बाद के दिनो में जातिवादी सोच रखने वाले इतिहासकारो ने सर्वण और शुद्र के बीच युद्ध की संज्ञा दी और इतिहास की एक धारा इसी पर केन्द्रीत होकर लिखा गया।बाद के दिनों में पिछड़ा और अगड़े की राजनीत करने वाले राजनीतिज्ञ भी इस इतिहास का सहारा लिये। लेकिन किसी ने भी युद्ध में हुई पराजय के कारणों का न तो विशलेषण किया और ना ही हार के कारणों से सीख लेने की कोशिश की।


महिला आरक्षण के मसले पर एक बार फिर यह विवाद सामने आया हैं लालू,रामविलास,शरद और मायावती राजनैतिज्ञ लाभ और नुकसान को लेकर फैसले का विरोध कर रहे हैं ।लेकिन जिस अंदाज में पिछड़े जाति से जुड़े पत्रकार और बुद्दिजीवी इस मसले पर अपनी राय जाहिर कर रहे हैं मुझे लगता हैं कि दानव के लगातार हार का कारण इन्ही सोच में छुपा हैं।

इस मसले पर खुलकर चर्चाये होनी चाहिए और मुझे यह कहने में कोई संकोच नही हैं कि वैसे लोग जो समाज को देवता और दानव के रुप देखते हैं उनसे मैं पुछना चाहता हू कि इस देश के इतिहास में जितने समाज सुधारक हुए हैं जो दानवों के सावल पर समाजिक परिवर्तन लाने का काम किया हैं ।उनमें से चार पांच सुधारक को छोड़कर दानव जाति से आये हुए कितने लोग हैं।समाज तोड़ना और उस पर अपनी राजनीत करनी अलग बात हैं लेकिन समाज में बदलाव लाने के लिए अपने कुटुभ से वगावत कर आपके हक की लड़ाई लड़नी बहुत बड़ी बात हैं।सिर्फ दानव कुल में पैंदा लेने से ही कोई दानव का सबसे बड़ा हितैसी नही हो सकता और इतिहास गवाह हैं कि ऐसा हुआ भी नही हैं।

वीपी सिंह ने जिस अंदाज में मंडल कमीशन लागू किये इसको लेकर बहस हो सकती हैं लेकिन इस राजनीत के बल पर सत्ता हासिल करने वाले लालू,मुलायम,शरद,रामविलास और मायावती जी क्या कर रही हैं।लालू प्रसाद के बिहार में पला और बढा इसलिए कुछ ज्यादा ही एहसास हैं जरा मैं पुछना चाहता हू उन पत्रकार और बुद्धिजीवीओ से लालू प्रसाद 15 वर्ष तक बिहार में शासन किया इसने दानवो के लिए क्या किया किसका चारा इन्होने लूटा कहते थे बड़े घर के लोग सड़क पर चलते हैं सड़क बनाने की जरुरत क्या हैं,बाढ का चावल और गेहू कागज पर ही बेच दिया इसमें देवता के हिस्से का चावल गेहू कितना था।

इसमे कोई शक नही हैं कि लालू के 15वर्ष के शासन काल में बिहार के समाज में काफी बदलाव आया लेकिन यह बदलाव किसी ठोस नतीजे पर नही पहुंच पायी और 15वर्ष होते होते दानवो के शासन का अंत हो गया।जिनकी चिंता हैं कि दानवो का शासन बना रहे उन्हे लालू के हार के कारणो से सीख लेनी चाहिए।

मयावती,मुलायम,और रामविलास का इसी अंदाज में हार तय हैं।नीतीश कुमार के महादलित कार्ट ने रामविलास के राजनैतिक कैरियर अंतिम दौड़ में ला खड़ा किया हैं और यही स्थिति मुलायम का हैं और आने वाले समय में मायावती का भी यही हाल होगा।भावनाओ को भड़का कर ज्यादा दिनो तक सत्ता में बने रहना सम्भव नही हैं।अब तो एक बार फिर से नांलेज की प्रधानता बढने लगी हैं। ऐसे हालात में बाजार और समाज में बने रहने के लिए देवता का चरित्र तो धारण करना ही पड़ेगा।

देवता ने तो अपने समाज के कोस्ट पर दानवो के लिए बहुत कुछ किया हैं लेकिन मैं पुछना चाहता हू दानवो के उस सरोकार से उसने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को दरकिनार कर दानवो के लिए क्या किया।वीपी सिंह ने आरक्षण लागू कर दिया लेकिन उस वक्त भी सवाल उठा था और आज भी सवाल उठ रहा हैं कि गांव में रहने वाले या फिर दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करने वाले मेघू यादव या फिर खलटु पासवान का बेटा सिविलसर्विस या किरानी का भी नौंकरी प्राप्त कर सका हैं दानवा जो सोचना होगा कहने के लिए रामविलास पासवान का भाषण मैं पिछले बीस वर्षो से सून रहा हू मैं उस घर में दिया जलाउगा जिस घर में सदियों से अंधेरा छाया हैं लेकिन जिसके घर में दिया जलाने का वादा कर वोट लेते रहे उसके घर में आज तक दिया नही जला लेकिन अपने पूरे खानदान को सांसद और विधायक बनाकर अपना घर तो रोशन कर ही लिया।जिस महिला आरक्षण बिल को लेकर हाई तोबा मच रहा हैं लोग तो यहां तक कहने लगे की इस बिल के बहाने देवताओ के घर को रोशन करने की साजिश चल रही हैं।मै उनसे पुछना चाहता हू लालू प्रसाद के पार्टी में सबसे योग्य महिला राबड़ी देवी ही थी।क्या मुलायम सिंह यादव के पार्टी में सबसे योग्य महिला उनकी पुतुहु डिम्पल यादव ही थी।दानव भाई देवता को पराजित करना चाहते हो तो त्याग करना सीखा नही तो आने वाले समय में आपको औऱ बुरी स्थिति देखनी पड़ सकती हैं।क्यो कि सत्ता आपके हाथ में और सत्ता के शिखर पर जाने की चांभी भी आपके ही के हाथ मैं हैं।अंतिम आदमी के लिए नही कुछ किया तो फिर लाख चाहने के बाद भी दक्षिण भारत की तरह एक बार फिर देवताओ के हाथ में सत्ता चली जायेगी औऱ आप संख्या बल के राग अलापते रह जायेगे।समय हैं सुधर जाये नही तो वक्त अब दूर नही रह गया हैं.।मेरी भी इक्छा हैं कि दनावो का शासन रहे लेकिन दानवो के कोस्ट पर नही।लेकिन दुख हैं जो सवाल एक तथाकथित देवता कुल का व्यक्ति खड़ा कर रहा हैं वह सवाल दानवो की और से उठनी चाहिए थी। जब तक यह नही होगा।देवता का शासन चलता रहेगा।

रविवार, मार्च 07, 2010

महिला दिवस पर विशेष आलेख,आधी आबादी की संवेदनहीनता पर शर्म आती हैं--1


आज मैं ऐसे विषय पर अपनी राय व्यक्त कर रहा हूँ जिस पर लोग अक्सर सार्वजनिक रुप से राय व्यक्त करने से परहेज करते हैं।इतिहास का छात्र रहा हूं इसलिए इतिहास के माध्यम से इस विषय पर कुछ लिखना चाह रहा हूं।औरतों के मामले में इतिहास में दो तीन बाते को बड़ी गम्भीरता से लिखी गयी हैं।श्रृग्वेद भारतीय इतिहास की पहली पुस्तक मानी जाती हैं जिसकी रचना ईसा पूर्व 1500आकी गयी हैं।इसकी एक सहायक ग्रंथ हैं शतपथ ब्राह्रमण जिसमें प्रतापी राजा पुरु और परी उर्वशी की कहानी लिखी हैं।जरा आप भी पढ ले।राजा पुरु उस समय के काफी प्रभावशाली राजा थे बाद के दिनों में इन्ही के वशंज भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा ।पृथ्वी के राजा पुरु के कार्यशैली से प्रभावित होकर सभी भगवानों ने सर्वसम्मति से स्वर्ग का राजा भी पुरु को बनाने का फैसला लिया।


शपथ ग्रहण की तारीख तय हो गयी यह खबर जब राजा इन्द्र को लगी तो वे हैरान हो गये, और राजसत्ता हाथ से निकलने की व्यथा में वे बिमार पड़ गये।स्थिति इतनी बिगड़ गयी की वे तीन दिनों तक अपने कक्ष से बाहर ही नही आये। इन्द्र का हाल देखकर उनके सबसे प्रिय परी उर्वशी को इसकी सूचना दी गयी वह भागी भागी इन्द्र के पास पहुंची और सारा बात सूनकर जोर से हस पड़ी बोली महराज आपकी सत्ता हमारे रहते जाने वाली नही हैं।उसने राजा पुरु के लोकेसन को सेटेलाईट से देखी तो उस वक्त राजा पुरु जंगल में शिकार कर रहे थे। उर्वशी इन्द्रलोक से उड़ी और राजा पुरु के सामने प्रकट हो गयी उर्वशी की सुन्दरता देख कर राजा इस तरह मोहित हो गये की उन्हे याद भी नही रहा कि उनका शपथ ग्रहण होना हैं।उर्वशी उनके साथ तबतक रही जब तक की शपथ ग्रहण की अवधी खत्म नही हो गयी ।अवधि खत्म होते ही उर्वशी राजा पुरु को छोड़कर इन्द्रलोक चली गयी वही राजा पुरु उर्वशी के प्यार में इस कदर पागल हो गये कि उन्हे याद भी नही रहा कि वह पृथ्वी लोक का राजा हैं।पागल की तरह जगलों में भटकते बस एक ही राक अलापते रहे उर्वशी कहा हो उवर्शी ।यह सिलसिला वर्षो तक जारी रहा कि एक दिन राजा पुरु तलाब के किनारे बैठ उर्वशी की याद में विलख रहे थे वही तलाब में सात आठ हंस तैर रही थी।तभी एक हंस की नजर राजा पुरु पर पड़ा वह चौक उठी अरे ये तो प्रतापी राजा पुरु हैं क्या हाल बना रखा हैं।हंस के रुप में सभी परी थी उस परी में उर्वशी भी थी



उसने सारी बाते अपनी परी मित्र को सुनायी,कहानी सुनने के बाद परियो ने कहा उर्वशी यह तुमने ठीक नही किया इसे समझाना चाहिए।सभी हंस अपने रुप में प्रकट हुई उवर्शी को देख राजा पुरु का रो रो कर हाल बुरा था ।तभी एक परी ने राजा पुरु को जोर से हिलाया और कहा राजा साहब आप किस गम में खोये है,महिलाओ में दोस्ती जैसी कोई चीज नही पायी जाती हैं क्योकि उसका दिल आधी भेड़िया के समान होता हैं।इस सच को स्वीकार करे और उर्वशी को लेकर इतने इमोशनल होने की जरुरत नही हैं।(फ्रेन्डशिप इज नाट टू वी फाउन्ड इन ए वीमेंन वीकाउज देयर हार्ट इज डाईट आंफ ए जेकाल)

दूसरी बार औरतो को लेकर भगवान गौंतम बुद्ध और उनके शिष्य आनंद और गौतमी के बीच धर्म में महिलाओं को शामिल करने को लेकर हुई वार्ता मे सामने आयी हैं। जब बुद्ध ने कहा कि बौद्ध धर्म में महिलाओ को शामिल किया गया तो यह धर्म पाच सौ वर्ष से ज्यादा नही चलेगा।तीसरी बार तुलसी दास ने नारी को तारन का अधिकारी लिखा ।

हलाकि इतिहास में दर्ज इन पहलुओ से मैं पूरी तौर पर सहमत नही हूं लेकिन 21वी सदी के इस दौड़ में जहां महिला और पुरुषों के बीच समानता की बाते की जा रही हो इस दौर में आधी आबादी के चरित्र को देख कर इतिहास में दर्ज विशलेषण पर सोचने पर मजबूर हो गया हूं ।

जरा आप भी सोचे कल पूरे देश में जहां महिलाओ के ससंद में आरक्षण को लेकर बहस चल रही थी और जिसके लिए यह बहस हो रहा था वे सभी राहुल महाजन के स्वयंवर देखने में मस्त थी ।मैं भौचक हूं जहां खूलेआम महिलाओ के चरित्र की बोली लगायी जा रही थी देश में कही से भी विरोध का कोई स्वर सुनाई नही दिया। कहा गयी वह महिला संगठन जो बात बात में महिलाओ के अधिकार को लेकर झंडा उठाते रहती हैं।वह फैमनिस्ट कहा गयी जो पुरुष और महिलाओं के फर्क करने वालो पर लात जूते बरसाती थी।जिस तरीके से करोड़ो लोगो के सामने महिलाओं के मान और सम्मान को राहुल महाजन अपने जूते से रौदते रहा और इस देश की आधी आबादी देखती रही मुझे लगता हैं कि भगवान बुद्ध की धारना मैं वाकई दम था।कल जो कुछ भी टीवी पर चल रहा था क्या यह 13वर्षीय बच्ची के साथ बीच सड़क पर सामूहिक बलात्कार की घटना से कम थी क्या। लेकिन जिसको आवाज उठानी चाहिए थी वो टीवी सेंट पर घंटो टकटकी लगाये देख रही थी।यह सवाल आपसे औऱ इस देश की आधी आबादी से हैं जिस तरीके से आज महिलाओ की नुमाईस हो रही हैं क्या वाकई महिला इसे अपना विकास मानती हैं।(क्रमश0)

रविवार, फ़रवरी 14, 2010

नीतीश के दामन पर लगा दाग मीडिया की खुली कलई

नीतीश सरकार पर पहली बार घोटाले का आरोप लगा हैं आरोप किसी विपक्षी पार्टी ने नही लगाया हैं बल्कि इनके मंत्रीमंडल के सदस्य ने लगाया हैं।आरोप हैं शराब माफियाओं के साथ मिलकर दस हजार करोड़ के घाटाले का।उत्पातमंत्री जमशेद असरफ ने इस घोटाले मैं मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका पर भी सवाल उठाया हैं।मंत्री की माने तो विभाग में जारी घोटाले को लेकर पिछले छह माह से मुख्यमंत्री से मिलने का समय मांग रहे हैं लेकिन मिलने का समय तक नही दिया जा रहा हैं।मजबूरन केविनेट की बैंठक में घाटाले से जुड़ी तमाम बाते साक्ष्य के साथ मुख्यमंत्री को लिखित रुप में दिये लेकिन कारवाई नही हुई।मंत्री की माने तो घोटाले को लेकर पिछले छह माह से लगातार फाईल पर लिख रहा हू लेकिन मंत्री के विरोध के बावजूद इस पर रोक नही लगा। इस घोटाले का तार नीतीश के सुशासन की सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही शुरु हो गया था।जरा आप भी गौर करे।नीतीश सरकार सत्ता सम्भालते ही निर्णय लिया कि सरकार शराब खुद बेचेगी और इसके लिए बिहार राज्य बेब्रिज कांरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया। जो शराब के बिक्री का कार्य करेगा।उस समय उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने शराब माफिया को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाने की बात कही थी।नयी नयी सरकार बनी थी लोगो को भी लगा कि सरकार जनता के हित में ही यह फैसला लिया हैं। लेकिन धीरे धीरे सरकार की मंशा सामने आने लगी और सरकार की भूमिका इस्टइंडिया कम्पनी जैसी हो गयी। शराब बैचने के लिए गांव गांव में लाइसेन्स दी जाने लगी और आज स्थिति यह हैं कि गांव में दवा की दुकान नही हैं लेकिन शराब की दुकान कही भी मिल जायेगी।सरकार के आकड़ो को ही माने तो सूबे में दुध से अधिक शराब की बिक्री हो रही हैं।


इस पूरे घोटाले में विजय माल्या की कम्पनी मैकडेव्ल की भूमिका प्रमुख मानी जा रही हैं।जिस पर सरकार के मिली भगत से अन्य राज्यों की तुलना में तीन सौ रुपया प्रति पेटी अधिक मुल्य पर बेब्रिज द्वारा शराब खरीदने की बाते सामने आयी हैं।मामले में कितनी सच्चाई हैं यह तो जांच के बाद ही सामने आयेगी लेकिन विजय माल्या के बिहार प्रेम से लोगो को संदेह जरुर बढा हैं और मंत्री के दावे पर किसी निष्पक्ष ऐजेसी से जांच कराने की बात जायज लग रही हैं।मामला सिर्फ अधिक कमित पर शराब खरीदने से ही नही जुड़ा हैं मामला स्प्रीट के खरीदारी से भी जुड़ा हैं।सरकार पिछले वर्ष मार्च से जून तक दूसरे प्रदेशों को स्प्रीट बेचती हैं और फिर मांग की पूर्ति नही होने की बात कर 60रुपया एल पी अधिक मुल्य में उत्तर प्रदेश की सरकार से बेब्रिज स्प्रीट की खरीदारी करता हैं।आखिर सवाल यह हैं कि जब आपके पास मांग के अनुसार स्प्रीट उपलब्ध नही था तो फिर बेचने की क्या जरुरत थी संदेह यही से पैंदा हुआ और इस खरीदारी औऱ बिक्री में हजारो करोड़ के लेन देन की बात की जा रही हैं।

मामला जो भी हो लेकिन सुशासन की इस सरकार की कलई खुल गयी हैं।नीतीश कुमार को इस पर जबाव देनी चाहिए सिर्फ इतने कहने भर से कि नीतीश को खरीदने के लिए कोई टकसाल नही बना हैं यह कहना काफी नही हैं।मंत्री द्वारा उठाये गये सवालों का जबाव तो आना ही चाहिए।

तस्वीर का दूसरा पंक्ष तो नीतीश सरकार से भी घिनौना हैं।उत्पाद मंत्री पिछले छह माह से इस घोटाले को लेकर मीडिया को लगातार बताते रहे लेकिन किसी ने भी इतनी बड़ी खबर को छापने की जहमत नही उठाई शुक्रगुजार माने बीबीसी की जिसने इस घोटाले को पूरे विश्व में उजागर किया ।फिर भी इस मसले पर बिहार की मीडिया खामोस ही रही शुक्रगुजार सूचना जनसम्पर्क मंत्री की माने जिन्होने एक अखबार के विज्ञापन पर रोक लगा दिया प्रबंधक से लेकर संपादक तक इसके लिए मंत्री के दरवार में माथा टेकते रहे लेकिन मंत्री ने एक न सुनी तो महाशय इस खबर को मुख्य पृष्ट पर छापकर नीतीश सरकार को खुली चुनौती दे दी।कहते है खबर छपते ही सरकार सक्रिय हुई और अखवार के प्रबंधक से विज्ञापन के नाम पर समझौता हो गया।यह आरोप अखवार पर आम पाठकों ने लगाया हैं क्यो कि जिस अखबार ने इतने बड़े धोटाले के पर्दाफास करने का दावा कर रही थी, कल होकर अचानक यह खबर अखबार के पेज पर से गुम हो गयी।पाठको का शंक लाजमी हैं और यह सवाल खड़ा करना की वैश्या की भी अपनी मर्यादा होती हैं कही से भी अमर्यादित नही हैं।

रविवार, फ़रवरी 07, 2010

मुझे अपनो ने ही लूटा गेरौ में कहा दम था

चुनाव आयोग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति ने पैसे लेकर खबर छापने की जमकर आलोचना की थी। यह मामला अभी शांत भी नही हुआ था कि फिल्म रण ने मीडिया की कलई खोल कर रख दी। पटना में तो वाकायदा एक संगठन ने सभी मीडिया हाउस को रण फिल्म देखने के लिए आमंत्रित भी किया बड़ी संख्या में पत्रकार फिल्म देखने भी गये पता नही फिल्म का असर पड़ा भी की नही।वही दूसरी और मीडिया के कार्यशैली पर पटना में दो दो सेमीनार हुए हैं जिसमें लोगो ने मीडियाकर्मियों पर जमकर भरास निकाली।यू कहे तो बिहार में इन दिनों मीडियाकर्मी के कार्य को लेकर पूरे समाज में बहस छिड़ी हैं।आमलोग खुलकर आलोचना करने लगे हैं गांव की चौपाटी पर या फिर किसी सरकारी दफ्तर में या फिर किसी कांलेज के कैम्पस में चले जाये मीडिया को लेकर बहस हो रही हैं।कभरेज करने जाये कही न कही से यह आवाज जरुर सुनाई देती हैं कि अरे यह साला सब बिका हुआ हैं।पटना में यह वाकया आये दिन बढता ही जा रहा हैं लोगो का विश्वास लगभग समाप्ति की और हैं राजनैतिक दलों का हाल तो यह हैं कि संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों को खरी खोटी सुनाते है और कहते हैं आप तो नही ही छापेगे।इन दिनों बिहार के कांग्रेसी नेता मीडिया वालो से काफी खफा चल रहे हैं।राहुल गांधी ने पटना में पत्रकारो से बात करते हुए कहा था कि नीतीश की नीयत सही हैं लेकिन इनपिलीमेनटेशन में पूरी तौर पर असफल हैं।लेकिन अखवार वालों ने बयान ही बदल दिया राहुल बोले नीतीश के इरादे नेक पर काम में कमी, इसी तरह किसी अखवार ने छाप दिया राहुल ने नीतीश की तारीफ की।यह तो बानगी हैं बिहार कोई आये पहला सवाल पत्राकारों का होगा बिहार कैसा लग रहा हैं भला कौन कहेगा कि बिहार बूरा हैं कहा और बस सुबह के मुख्यपृष्ठ की लीड खबर होगी अमेरिकन राजदूत ने नीतीश के कार्यशैली को सराहा,बिहार बदल रहा हैं।एक वर्ष के अखबार को देखेगे तो इस तरह के हेंडिग आये दिन देखने को मिलेगा।अब तो आम पाठक भी बिहार साईनिंग और फिलगुड की बात करने लगे हैं।एक गैर पत्रकार मित्र द्वारा इस और इंकित करने पर मैने भी एक अभियान चलाया कि अखबार बिहार को लेकर जो खबरे लिख रहे है उसकी पड़ताल की जाये


जरा आप भी गौर करीये जिस पत्रकार ने बिहार के मैरेकल इकोनोमीग्रोथ को लेकर कांलम लिखा उसी पत्रकार ने 25अप्रैल 2007को लिखा था कि लालू नेहरु से भी बड़ा नेता  हैं और इसके कार्यकाल में बिहार का इकोनोमीग्रोथ पंजाब से भी अधिक था हलाकि इस आलेख में लालू के कार्यकाल के दौरान की खामिया भी गिनायी गयी हैं लेकिन लेख के माध्यम से लालू का महिमामडित ही किया गया हैं।(इंडेक्स से सहारे आप लेख पढ सकते हैं।)इसी तरह इकोनोमीस्ट पत्रिका बिहार के बारे में लिखा लेकिन अखबारों ने पत्रिका की आधी बात छापी और ऐसी बाते भी छापी जो उस लेख में लिखा ही नही हैं।ऐसे कई उदाहरण हैं। पता नही बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन को लेकर इस तरह की खबर लिखने की होड़ क्यो मची हुई हैं।मेरी नजर में  पत्रकार शायद इस दुनिया के पहले प्रोफेसनल हैं जो अपने प्रोफेसन की साख दाव पर लगा कर व्यापार कर रहे।
1-Laloo Yadav beats Nehru hollow

25 Apr 2007, 0043 hrs IST, Swaminathan S Anklesaria Aiyar,
2-India's new miracle economies: Bihar, poor states                                                                                     3 Jan 2010, 1020 hrs IST, Swaminathan S Anklesaria Aiyar, ET Bureau
3--Bihar has blossomed under Nitish Kumar. But his reforms need deeper roots                                          Jan 28th 2010
PATNA
From The Economist print edition
4--हिन्दुस्तान,30जनवरी2010,पटना ऐडिसन
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका इकाँनामिस्ट ने ताजा अंक में नीतीश को सराहा
बिहार की विलक्षण उपलब्धि(नई दिल्ली डेट लाईन से ऐंजसी की खबर हैं)

5--हिन्दुस्तान,3फरवरी 2010,पटना ऐडिसन

राहुल बोले,नीतीश के इरादे नेक पर काम में कमी









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