सोमवार, अक्तूबर 06, 2008

बेबस कलम

वो भी दिन थे जब कलम चलती थी तो नगाड़े का शोर भी दब जाता था। समय का पहिया घूमता रहा और अब वही कलम तूती की आवाज भी नही बन पा रही है । शायद मेरा ये ब्लॉग बहरी व्यवस्था के कानो की मोटी चमड़ी के पार जा सके। कुछ ऐसे ही इरादों के साथ आपके सामने आया हूँ । आज बस शुरुआत, आगे ढेर सारा जहर उगलना बाकी है ।

5 टिप्‍पणियां:

fulendra kumar ने कहा…

Poisionous material send negative message to the youngsters.Try to mend message like mirch masala kuch khatte kuch tite and like jam kuch khatte aur kuch mithe.

सत्यबोध ने कहा…

mr. phulendra, it is well known that truth is bitter than fiction. that's why u r mentioning 'poisonous' word for santosh's article.
sanjay

Mukesh hissariya ने कहा…

जय माता दी,
कम शब्दों में गूढ़ बात कह देने के कला ने हमें आपका कायल बना दिया है.

prem ने कहा…

मलहम से अब क्या होगा घाव अब नासूरी है,
अब तो इसका चोर फार करना एक मजबूरी है:
और कोई कहे यह हिंसा है,
है तो है और होगी क्योंकि बहूत ज़रूरी है.
अपने कलम को बूजने मत दीजयेगा आग से टपके ही सोने की सुधता आती है

vijay srivastava ने कहा…

अपना अपना किस्सा है. अपना अपना राग. दुनिया अब ऐसे ही चलेगी. सुधर सकें तो हम ही क्यों नहीं थोड़े सुधर जाते.
विजय