रविवार, मई 03, 2009

इतिहास नीतीश को दूसरे औरंगजेब के रुप में याद रखेगा

राजनैतिक विशलेषको और भाजपा जद यू के हल्ला बोल पार्टी और मीडिया के एक बङे तबके की माने तो नीतीश की आंधी पूरे सूबे में चल रही हैं।कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि बिहार में 1977वाली लहर चल रही हैं।परिणाम जो भी हो लेकिन इस बार के चुनाव में बिहार की जनता ने लालू और रामविलास पासवान के राजनैतिक कैरियर पर विराम लगाने का प्रयास अवश्य किया हैं।पिछले कई दशक से जातिये राजनीत के बल पर बिहार की जनता के दिल पर राज करने वाले इन दोनों नेताओं की यह शायद आखिर पारी न साबित हो। कहने का यह मतलब हैं कि बिहार में जातिये समीकरण पर चुनाव लङने की वर्षों पुरानी शैली का अंत होता दिख रहा हैं ऐसे में अब जातिये नारो पर बिहार में राज करना सम्भव होता नही दिख रहा हैं।जो भी हो बिहार वाकई बदल रहा हैं और अपने गौरवशाली इतिहास की और लौटने की प्रवृति बलवति होती दिख रही हैं।चुनाव के जो भी परिणाम हो लेकिन बिहार के लोगो ने नीतीश कुमार के तथाकथित सुशासन और विकास के दावे को भी लोगो ने सिरे ने नकार दिया हैं।1962के बाद बिहार में सबसे कम पोलिंग इसी चुनाव में हुआ है।लोगो ने काग्रेस को हाथों हाथ लिया जहां कांग्रेस का कोई नाम लेवा नही था वही आज सभी वर्गो के जुवान पर कांग्रेस का नाम हैं।लालू और रामविलास के हार का कारण भी कांग्रेस ही बनेगा।हो सकता हैं कि बिहार में कांग्रेस खाता भी नही खोल सके लेकिन एक बङी ताकत के रुप में जरुर उभर कर सामने आयेगा जो नीतीश और लालू राम विलास तीनों के लिए शुभ संकेत नही हैं।नीतीश कुमार फले ही ऐतिहासिक जीत दर्ज करे लेकिन बिहार की शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने के लिए इन्हे याद किया जायेगा।वही बिहार की राजनीत में जिस तरह से इन्होने मौका परस्ति और जातिये राजनीत के आङ में राजनीत का जो धिनौना खेल खेला हैं इतिहास औरंगजेब के बाद इन्हे शिद्दत से याद करेगा।जिस जार्ज ने लालू के अंहकार के खिलाफ बिहार में पार्टी खङी की और लालू प्रसाद को सत्ता से बेदखल किया उनके साथ नीतीश का व्यवहार शायद राजनीत का सबसे घिनौना चेहरा साबित होगा ।हो सकता हैं इस बार मुजफ्फरपुर में जार्ज की जमानत भी नही बचे लेकिन चुनाव अभियान के दौरान बिहार की जनता के सामने एक यक्ष सवाल जरुर खङा कर दिया हैं।क्या राजनीत में मौका परस्ति अनिवार्य हैं।जार्ज और दिग्विजय सिंह के साथ नीतीश कुमार को जो व्यवहार रहा शायद इस चुनाव का सबसे दुखद पहुली माना जायेगा।नीतीश भले ही ऐतिहासिक जीत दर्ज कर भारतीय राजनीत में एक नये क्षंत्रप के रुप में स्थापित हो जाये। लेकिन इनका यह मौका परस्ति इनके राजनैतिक सफर के अंत के लिए मील का पत्थर न कही शाबित हो जाये।

3 टिप्‍पणियां:

Sachi ने कहा…

मैं आपसे सहमत नहीं हूँ, वैसे भारतीय राजनीति में बुड्ढे ही हैं, जो ठीक से चल नहीं सकते वे भला देश क्या चलाएंगे? एक भी नेता नहीं है, मगर लालू से बढ़कर बिहार का बेडा किसी ने भी गर्क नहीं किया . नितीश ने फिर भी कुछ किया है . कांग्रेस से दुश्मनी लालू ने ली और वे अब भुकतेंगे..

mahashakti ने कहा…

जिसमे खाया उसी में छेद

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

SANTOSH BHAAI AAPASE BAAT KAISE HO SAKATI HAI???

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