रविवार, मई 16, 2010

कोडरमा पुलिस निरुपमा की मौंत को हत्या मान रही हैं तो फिर हाई तौबा क्यो--


निरुपमा की मौंत को लेकर मचे बवाल पर जिस तरीके से प्रियभांशु के मित्र व्यवहार कर रहे हैं मुझे लगता हैं कि इसका जबाव अब खुल कर देने की जरुरत हैं।कल तक मैं बहुत कुछ जानते हुए भी समाजिक दायुत्व बोध के कारण लिखने से परहेज कर रहा था। लेकिन अब सब्र का बांध टुट गया हैं।बेनामी प्रतिक्रिया देने वालो से मेरी


खास बिनती हैं, मै जो कुछ भी लिख रहा हू वह सब कुछ आपके सामने हैं, मैं कौन हू कहा रह रहा हू और मेरी क्या हेसियत हैं,वह सब को पता हैं ।लेकिन जिस तरीके से अर्मादित भाषा का उपयोग कुछ बेनामी लोग कर रहे हैं उनसे मेरी खास बिनती हैं नाम और पहचान के साथ सामने आये।

दोस्ती मुझे भी निभानी आती हैं लेकिन इस अंदाज में नही हमारे औऱ आप मैं फर्क सिर्फ इतना हैं कि आप प्रियभांशु को बचाना चाहते हैं और निरुपमा के पूरे परिवार को फांसी पर चढाना चाहते हैं।और मैं चाहता हू कि निरुपमा के मौंत के लिए जिम्मेवार व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सजा मिले।जब निरुपमा के मौंत को आज तक पुलिस हत्या मानकर उसके माँ को जेल में बंद कर रखा हैं तो मुझे ये समझ में नही आ रहा हैं कि दिल्ली में इसको लेकर हाई तौंबा क्यो मची हैं।क्यो कोडरमा पुलिस पर निष्पक्ष जांच नही करने का आरोप लगाया जा रहा हैं।केडिल मार्च निकाल कर क्या साबित करना चाहते हैं।निष्पक्ष जांच की मांग तो निरुपमा के परिवार वाले को करनी चाहिए जिन्हे दोहरी सजा दी जा रही हैं।एक तो मीडिया ने पूरे परिवार को आँनर किलिंग के नाम पर जिन्दा में ही मार दिया हैं और दूसरी और उस माँ को जिसने निरुपमा जैसी पवित्र बेटी को नौ माह तक अपने कोख में पाली और लोरी सूनाकर बड़ी की, और उसकी हत्या के आरोप मैं आज वह जेल में बंद हैं।किसी ने सोचा हैं उस माँ पर क्या बित रही होगी जिसने निरुपमा की शादी के जोड़े से लेकर मांगटीका तक खरीद कर रखी हुई थी।इस और आप सबो को सोचने की जरुरत नही हैं ।क्यो की आप सभी ऐसे जबावदेह भारतीय यूथ हैं जिन्हे सिर्फ अपनी आजादी से मतलब हैं दायुत्व से नही।ऐसा नही हैं कि मुझे कांलेज छोड़े ज्यादा दिन हुआ हैं जिस आजादी और स्वछदंता से जीने की आप हिमायती बन रहे हैं उसके पंक्ष धर मैं भी हूं। जिस संस्थान में पढने का दंभ आप भर रहे हैं तो आपकी जानकारी के लिए मेरी पढाई भी दिल्ली विश्वविधालय के ऐसे काँलेजो से हुई हैं जहां नामकंन होने पर लोग गर्व महसूस करते हैं लेकिन इसका मुझे कोई गरुर नही हैं।एक बेनामी साथी ने लिखा कि अगर तुम मेरे दरबाजे पर नौकरी लेने आये तो धक्के मार कर बाहर कर देगे।मेरी विनती हैं उन साथियो से जिन संस्थान में वे काम कर रहे हैं उस संस्थान के सबसे बड़े पत्रकारो जो होगे उनसे मेरे बारे में जानकारी लेगे।छोड़िए मैं भी विषय से अलग होकर थोड़ा अंहग में आकर कुछ ज्यादा ही लिख दिया अब सबाल जबाव हो जाये।

मैने पत्रकारिता के माध्यम से कई बड़ी जंग जीत चुका हू लेकिन आज मैं जितना खुश हू उतनी खुशी आज तक नही हुई थी।निरुपमा और प्रियभांशु के कई मित्रो ने मुझसे बात करने की इक्छा जाहिर की और कई से मेरी बात भी हुई जिस अंदाज से उन्होने मुझे सराहा उसकी कल्पना मैने नही की थी।सबो का सिर्फ इतना ही कहना था आपने जो सबाल खड़े किये हैं क्या वाकई उसमें सच्चाई हैं। जब उसने सारी बाते सूनी तो कहा हमलोगो से बड़ी गलती हो रही थी।प्रियभांशु और निरुपमा की कांमन लड़की मित्र तो बात करते करते रो पड़ी बोली मुझे भी लग रहा था कि प्रियभांशु उसके साथ ब्लेकमेल कर रहा हैं।सबो ने निरुपमा के न्याय के खातिर इस लड़ाई को जारी रखने की विनती की और उसी का परिणाम हैं कि मैं दुगुने उत्साह के साथ इस जंग को जारी रखने का फैसला लिया हैं।और सबसे बड़ी बात जिस लड़के लड़कियो ने मुझसे बात की मैने उनसे एक ही सबाल किया सोसोईड नोट का लिखावत किसका हैं सबो ने कहा यह लिखावत निरुपमा की हैं।

1-पहला सवाल प्रियभांशु के मित्रो से हैं आपको कुछ भी करने से पहले यह जरुर सोचना चाहिए की आप पत्रकार हैं और आप सबसे पहले जनता के लिए जबावदेह हैं।जिसने आपको घोषित तौर पर देश का चौथा स्तम्भ मान रखा हैं।जिस तरीके से आप एक्ट कर रहे हैं किसका भला कर रहे हैं।

2-इस आन्दोलन से किसको क्या मिला प्रो प्रधान की बीबी की नौकरी पक्की हो गयी हिमांशु के वेभ अखवार चल परे, सुमन को दिल्ली लौटने का प्लेट फर्म मिल गया और मुहल्ला वाले अविनाश को दरभंगा के पंडित को नीचे दिखाने का मौंका मिल गया।वही चमरिया साहब को एक बार फिर से जनवादी दिखाने का मौंका मिल गया। लेकिन जिसे कुछ नही मिल वह कौन हैं निरुपमा, जिसके सबंधो के बारे में क्या क्या नही लिखा गया और क्या क्या नही दिखाया गया।

3-काश निरुपमा भी कौनभेन्ट में पढी रहती थी तो यह दिन उसे देखने को नही मिलता कोडरमा जैसे छोटे शहर में पली बढी जहां शिक्षक के साथ साथ छात्राये क्लास रुम में आती हैं और शिक्षक के निकलने से पहले छात्राये बाहर निकल जाती हैं।साथ पढने वाले लड़को की परछाही भी कभी कभी ही देखने को मिलता हैं। ऐसे जगह से सीधे निरुपमा दिल्ली पहुंचती हैं जहां लड़के औऱ लड़कियो के आपसी सम्बन्ध कपड़ो की तरह रोज बदलते रहते हैं।वैसे सोसाईटी में गांव की भोली भाली सीधी सादी निरुपमा पहुंचती हैं जिसके जीवन में पुरुष के रुप में भाई और पापा के अवाला दूसरा कोई नही आया था।कांलेज पहुंचते ही गिद्दो की उस पर नजर पर गयी और उस गिद्द में प्रियभांशु सबो से तेज निकला जिसने बिहारी होने और भोले भाले सुरत के सहारे निरुपमा को अपने जाल में फंसाने में कामयाब हो गया।आज जो को कुछ भी निरुपमा के साथ हुआ उसके लिए सिर्फ और सिर्फ प्रियभांशु जिम्मेवार हैं जिसने धोखे में निरुपमा के साथ शाररिक सम्बन्ध बनाया और उसके बाद उसके साथ ब्लेकमेलिंग किया।प्रियभांशु को पता नही था कि इनटरकास्ट मैरेज करने में उसको अपने परिवार का कितना सहयोग मिलेगा ।दिल्ली में रहने वाले के लिए ये कोई बात नही हो सकती लेकिन बिहार में आज भी कोई लड़का इंटरकास्ट मैंरेज करता हैं तो उसकी बहन के शादी तक में परेशानी होती हैं इतना कुछ जानते हुए भी प्रियभांशु ने इतना बड़ा कदम कैसे उठाय़ा।कानून और धर्म भी कहता हैं कि धोखा में कोई सम्बन्ध बनाता हैं तो वह सम्बन्ध बलात्कार के श्रेणी में आता हैं।

4-क्या आधुनिक दिखने के लिए इस तहर के सम्बन्ध बनाना आजकल महानगर की संस्क़ृति नही बन गयी हैं। क्या पत्रकारिता का यही मतलब हैं कि इन सम्बन्धो के आधार पर एक कहानी गढी जाये औऱ उसे टीआरपी के लिए भुनाया जाये ।क्या पत्रकारिता का यह दायुत्व नही हैं कि इस तरह के सम्बन्धो के कारण रोजना दिल्ली जैसे शहरो में बिन बिहायी मां की संख्या बढती जा रही हैं।और इसके कारण पूरी परिवारिक जीवन चौपट हो रहा हैं।क्या यह स्टोरी नही हैं।जिस मां बाप ने अपनी जिंदगी की चैन और सुख हराम कर अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा देने के लिए अपनी जमीन और जेबरात तक गिरबी रख देते हैं और बाद के दिनो में बेटे उन्ही माँ और बाप को गुमनामी की दुनिया में थपेरे खाने को छोड़ देता हैं क्या वह स्टोरी नही हैं।वह स्टोरी नही हैं क्यो कि वह बूढा माँ और बाप आज के इस बाजार की जरुरत नही हैं।

5-हम पत्रकार विरादरी कही कुछ भी होता हैं विवेचन करने बैंठ जाते हैं।कल ही बीबीसी के एक संवाददाता ने भेरोसिंह शेखावत के मौंत पर लिखा था कि यह शक्स जिसने अपने विरादरी के विरोध का परवाह नही करते हुए रुप कुउर के सति होने पर जमकर विरोध किया था। लेकिन आज खास पंचायत पर सवाल उठाने का साहस कोई राजनेता नही कर रहे हैं।यही सवाल मैं पत्रकारिता जगत के दो स्टार से करना चाहता हू रविस कुमार और पुण्यप्रसुन बाजपेयी जी आप सभी मसले पर बेवाकी से लिखते हैं लेकिन निरुपमा मामले में आपकी कलम क्यो खामोश हैं इस महाभारत में आपकी भूमिका भीष्म पितामह वाली क्यो बनी हुई हैं।आप जैसे लोग इस उद्दंता पर खामोश रहेगे तो फिर पत्रकारित का क्या होगा।

6-जेएनयू के बंधु से भी एक सवाल हैं चप्पल जींन्स,कुर्ता और सिगरेट के कस से क्रांति नही होती हैं।आपके प्रिय चन्द्रेशखर की हत्या किसने की सर्वविदित हैं। सीबीआई जांच कर रही हैं लेकिन दस वर्ष होने को हैं लेकिन अभी तक इस मुकदमे की प्रक्रिया भी शुरु नही हुई हैं लेकिन दुर्भाग्य हैं उनकी बरसी पिछले ही माह गुजरी हैं लेकिन कही से भी कोई आवाज नही उठा।शायद आप भूल गये होगे चन्द्रशेखर आपके विश्वविधालय के दो दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं डाँन शहाबुदीन के विरोध के कारण सिवान बाजार में दिनदहाड़े एक सभा के दौरान गोली से छलनी कर दिये गये। लेकिन आज उनका हत्यारा पकड़ा जाये उसका कोई बाजार भाव नही हैं इसलिए इसके याद करने का कोई मतलव नही हैं।

(आवाज उठनी चाहिए कारवा बनता जायेगा।)---




























11 टिप्‍पणियां:

सुधाकर ने कहा…

आप सही है, आवाज उठनी चाहिये..
मैं आपके कारवां में आपके साथ हूं

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

आपका प्रयास सरहनीय है |
प्रियभान्शु की लम्पट मित्र मण्डली निरुपमा को न्याय दिलाने की आड़ में अपने बचाव का खेल खेल रही है यदि पुलिस इन लम्पटों को पकड़कर जांच व कठोर पूछताछ करें तो कई गन्दी परतें उघ्ड़ेंगी |

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

सहमत

बेनामी ने कहा…

आपने जो लिखा है क्या वो सचमुच सच है?

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

एक सवाल जो सौ सवाल के बराबर है, दिल्ली के कुछ लम्पटों की एकतरफा बात तो समझ में आती है लेकिन मीडिया की इसमें सबसे ज्यादा संदेहास्पद भूमिका है, दिल्ली के कैंडल लाईट मार्च हो या प्रेस कल्ब से रैली खबर को सुर्ख़ियों के साथ प्रसारित करना मगर वहीँ कोडरमा की रैली या मार्च का मीडिया का नजरअंदाज करना यहाँ तक की प्रियाभंशु के पैत्रिक नगर दरभंगा में प्रियभांशु के खिलाफ महिला रैली निकालती है और छात्र संगठन दहरान देते हैं को नजरअंदाज करना पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करती है.
दिल्ली के एक वरिष्ट पत्रकार से बातचीत के दौरान मैंने जब इस मुद्दे पर पूछा तो छूटते ही उनका कहता था की दिल्ली के पत्रकार एक नंबर के कमीने हैं. अर्थात इस सारे मुद्दे को सिर्फ एक रंग देने की कोशिश दिल्ली से की गई.
अविनाश के चरित्र को बताने की जरूरत नहीं है की ये जनाब अपनी महत्वाकांक्षा के लिए किसी को भी बेच सकते हैं अपने पतित आचरण के लिए जनाब को प्रभात खबर ने निकला, अल्प बुद्धि के कारण एन डी टी वी ने बाहर का रास्ता दिखाया और बलात्कार के आरोप ने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को अपवित्र करने के कारण भास्कार समूह ने लात मार कर निकला और भोपाल वाशियों ने खदेड़ कर.
प्रश्न अपनी जगह है निरुपमा के लिए कौन लड़ रहा है ?

आपके सभी तर्कों से सहमत और एक आवाज मेरी भी.
आवाज बुलंद होती रहे

बेनामी ने कहा…

Jha sahab kaafi accha likha hai aapne

बेनामी ने कहा…

aap vastav me patrakarita ki alakh jaga rahe hai. aap logo se hi media me kuch logo ka vishvas bana huya hai...
aap apni muhim me safal ho.magalkamana.

jasminenigam ने कहा…

मैं निरुपमा की मित्र हूं और आप की बातों का जवाब देना जरूरी समझती हूं। आप की निरुपमा से जुड़ी सारी रिपोर्ट्स को मैनें पढ़ा है और मुझे भी उनमें निरुपमा के घरवालों की ओर से की जी रही एकतरफा रिपोर्टिंग की बू आ रही है। कई जगहों पर आपने नीरू के घरवालों की करूण दशा बयान की है। मुझे भी रिपोर्ट की जांच पर ही विश्वास है और आप का ब्लॉग मैने इसलिये पढ़नी शुरू की थी कि शायद आप की रिपोर्ट से ही कुछ सही बातें मिल पाये। पर आप की रिपोर्ट पढ़ते समय कई जगह पाया कि आप की लेखनी पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।

sanjay ने कहा…

आपके आर्टिकल को पढ़ने के बाद लग रहा है कि आपभी निरुपमा की तो नहीं लेकिन उसके घरवालों की वकालत कर रहे हैं। क्योंकि आपने जितने भी सवाल उठाए हैं हर सवाल में प्रियभांसु को दोषी ठहराया है। जबकी इस पूरे प्रकरण में प्रियभांसु के साथ निरुपमा ....

संतोष कुमार सिंह ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद आप हमारे ब्लांग पर आयी और पूरे बेवाकी से अपना पंक्ष रखी आपके विचारो से मैं सहमत हू हो सकता हैं मेरी लेखनी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो क्यो कि मैं न तो निरुपमा और ना ही प्रियभांशु को करीब से जानता हूं और ना ही दोनो के परिवार वालो से मेरा कोई वास्ता हैं। मैं जो कुछ भी लिख रहा हूं वह घटना से जुड़े साक्ष्यो पर आधारित हैं।जिसके कारण निरुपमा और प्रियभांशु के रिस्ते के वैसे पहलुओ पर भी लिखना पड़ रहा हैं जो आप जैसे दोस्त को अच्छा नही लग रहा होगा।लेकिन जब आप इस मामले का सच जानना चाहती हैं तो भावनाओ को दरकिनार करते हुए आप जरा मुझे बताये जो सोसाईड नोट मिला हैं वह लेखनी निरुपमा की हैं या नही। वही दूसरी और पत्र में जो कुछ भी लिखा गया हैं एक लड़की के नाते आप बेहतर समझ सकती हैं।मै प्रियभांशु पर सवाल इसलिए खड़ा कर रहा हू कि उसने इमानदारी से निरुपमा का साथ दिया होता तो निरुपमा की मौंत नही होती।उम्मीद हैं आप हमारे ब्लांक पर बेनी रहेगी आने वाले समय में आपको कई चौकाने वाली जानकारी से अवगत कराता रहुगा।रही बात आज के टाईम्स आफ इंडिया की खबर का जिसमें झारखंड के डीजीपी के हवाले से निरुपमा की हत्या की बात लिखी गयी हैं।इस मसले पर डीजीपी ने एक प्रेस वार्ता बुलाकर इस खबर का खंडन किया हैं साथ ही इन्होने यहा तक कहा कि अभी तक फौरेन्सिंक जाँच की रिपोर्ट आयी ही नही हैं।आखिर क्या आन परी हैं कि मीडिया के बंन्धु निरुपमा की हत्या की बात लिखने को लेकर इतना उत्साहित हैं।

बेनामी ने कहा…
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