गुरुवार, अगस्त 26, 2010

दर्शक न्यूज चैनलो से क्यो खफा है

पिछले तीन वर्षो के टीआरपी रेटिंग पर गौर करे तो न्यूज चैनल के दर्शको में अप्रत्याशित ढंग से कमी आयी है।एक से एक प्रयोग हो रहे है लेकिन दर्शक बढने के बजाय घटते ही जा रहे है।दिल्ली में बैठे मैनेजमैंन्ट गुरु को बुधवार आते आते ऐसी रुम में पसीने आने लगते हैं।स्थिति यह हो गयी है कि मीडिया फिल्ड के एक से एक धुरधर का आईडिया दूसरे सप्ताह आते आते पीट रहा है।मीडियाकर्मी परेशान है और पत्रकार ठहाके लगा रहे हैं। दोनो एक दूसरे को कोस रहे है स्थिति यहा तक पहुच गया है कि नेशनल चैनल के स्टेट हेड खबर में बने रहने के लिए कोई अखबार चला रहा है। तो कोई पत्रिका चला रहा तो कोई केबूल के माध्यम से समाचार चला रहा है। हर कोई मीडिया के फिल्ड में बने रहने के लिए हाथ पाव मार रहा है।वही स्ट्रींगर अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए जुगार टैक्नोलोजी का उपयोग कर रहे हैं।जिसके काऱण आये दिन मीडियाकर्मियो की भद पीट रही है।

ऐसे हलात में मीडियाकर्मी करे तो क्या करे माध्यम इतने आ गये है कि आप खबर को छुपा नही सकते और अब मीडियाकर्मी पर भी खबरे आ रही है,ब्लांग औऱ इंटरनेट अब मीडिया का एक सशक्त माध्यम हो गया है। मीडियाकर्मी हमेशा ऐसा ब्लांग पर क्लींक करते रहते है जिसके सहारे खबर बनायी जाये।कहने का मतलब यह है कि अब दर्शक के पास सिर्फ सुबह का अखबार ही नही रिमोंट के साथ साथ माउस भी आ गया है। जिसके सहारे अपने अपने पसंद की चीजे लोग खोज लेते है।

मुझे लगता है कि मीडियाकर्मियो को क्रिकेंट फिल्म और अपराध की थ्योरी से बाहर निकलना होगा क्यो कि इनके बारे में जानकारी कई और स्रोतो से दर्शको के पास पहुंच रहा है।वही चैनल में इन विषयो पर एक ही धरे में खबरे दिखाने की आदत लग गयी है। भारत जीता तो बाह बाह और दूसरे ही दिन हारा तो टीम को समुद्र में फैंक देनी चाहिए। क्रिंटकल विशलेषण नही होने के कराण दर्शक टीवी से दूर हो रहे है।

वही सूचना का माध्यम इतना ससक्त हो गया है कि अब आपका बकवास सूनने का वक्त किसी के पास नही है।वही सबसे बड़ी बात यह है कि मीडिया छात्र से किसान से और आम आदमी से अपने को जोड़ नही पा रहा है उनके पास आम आदमी से जुड़ी खबरे दिखाने का वक्त नही है जिसके कारण मीडिया धीरे धीरे आम आदमी से कटता जा रहा है। यही कारण है कि क्षेत्रीय चैंनल नेशनल चैनल से काफी आगे निकल गया है।

यह स्थिति सिर्फ पटना ,लखनउ,जयपुर और भोपाल में ही नही है दिल्ली मुबंई और बेगलुरु जैसे शहरो में भी है ।लोग खबर देखना चाहते है लेकिन नेशनल चैनल खास आदमी को ध्यान में रख कर अपनी दिनचर्या बनाते है।वही आम लोग अभी भी मीडिया को जनता का मददगार मानता है लेकिन मीडिया अपना विश्ववास खोता जा रहा है।मीडियाकर्मी के हाथ में लोगो क्या आ गया अपने को खास समझने लगता है यही प्रवृति मीडिया को दीमक की तरह खाया जा रहा है।मीडिया की ताकत का अंदाजा इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ,कोमनबेल्थ गैंम में इतने बड़े पैमाने पर घोटाले को लेकर मीडियाकर्मी चिल्लाते रहे लेकिन कोई रिस्सपोन्स नही मिला। वक्त आ गया है आत्ममंथन करने का

3 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

वक्त आ गया है आत्ममंथन करने का
जितनी जल्‍द समझ ले उतना ही फायदा है !!

Rajey Sha ने कहा…

चैनल वालों को भी सुझाव भेजे जाने चाहि‍ये।

Rajey Sha ने कहा…

चैनल वालों को भी सुझाव भेजे जाने चाहि‍ये।