बुधवार, मई 27, 2009

आइ0आइटी में बिहार का परचम लहराया

बिहारी छात्रों ने एक बार फिर देश की सर्वोच्च संस्थान आइ आइटी में अपना परचम लहराया हैं।यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से चला आ रहा हैं लेकिन इस बार का परिणाम कुछ खास हैं।पहली बार बङी संख्या में गांव के किसान, मजदूर और अल्पसंख्यक समाज के बच्चे सफल हुए हैं।इसका श्रेय कही न कही बिहार के वरिय आई0पी0एस0 अधिकारी अभयानंद और गणितज्ञ आनंद को जाता हैं ।जिन्होने बिहार के छात्रों में आइ0आइटी0 की परीक्षा में सफल होने का जुनुन पैदा कर दिया हैं।यही कारण हैं कि इस बार भी सुपर थर्टी,रहमानी थर्टी और त्रिवेणी थर्टी ने शतप्रतिशत रिजल्ट दिया हैं।इन संस्थानों का नकल करते हुए जीनियश 40,जैसी कई संस्थानों ने भी बेहतर परिणाम दिया हैं।आकङा पर गौर करे तो बिहार में परीक्षा की तैयारी करने वाले आठ सौ से अधिक छात्र सफल हुए हैं जिनमें से 90 प्रतिशत छात्र बिहार के सरकारी स्कूलों से पढकर यह कामयाबी हासिल की हैं ।और अधिकांश छात्र ग्रामीण परिवेश से जुङे हैं और पढने में औसत से बेहतर इनका रिजल्ट रहा हैं।अंग्रेजी और अंग्रेजिएट से इन सफल छात्रों का दूर दूर तक कोई वास्ता नही हैं।विक्रम राज को ही ले बिहार के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित गांवों में एक गया जिले के चौगाइ का रहने वाला हैं।इसी तरह छपङा के किसान का बेटा जो विजय नरायण(1548)स्थान पाया हैं।ऐसे कई नाम हैं जिनका आर्थिक और सामाजिक हैसियत कमोवेश एक ही जैसा हैं।इस सफलता का श्रेय भी सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दी जा सकती हैं। जिन्होनें स्पीडी ट्रायल का इंजाद कर पूरे बिहार में कानून का राज्य स्थापित करने वाले ए0डी0जी0पी0अभयानंद को जलील कर पुलिस मुख्यालय से बाहर कर दिया। और इनके ड्रीम सुपर थर्टी के सहयोगी आनंद को राजनैतिक महत्व देकर आपस में ही विवाद खङा करा दिया और स्थिति इतनी बिगङ गयी की अभयानंद को सुपर थर्थी को छोङना पङा।लेकिन कुछ ही दिनों बाद अभयानंद अपने आप को संभालते हुए पटना के अलावे पहली बार गया,भागलपुर और नीतीश कुमार के नालंदा में गरीब बच्चों के सहयोग के लिए आइ0 आइटी का कौचिंग संस्थान खोला जहां छात्रों को मुफ्त में पढाई और रहने खाने का प्रबंध किया।इसके लिए स्थानीय लोगो ने अभयानंद को काफी सहयोग किया और आइ0आइटी0 के कई पूर्ववर्ती छात्रों ने पढाने में सहयोग दिया जिसके बल पर इन संस्थानों में पढने वाले 55में 48छात्र सफल हुए।वही इस वर्ष से बिहार के कई और छोटे शहरों में अभयानंद का ड्रीम प्रोजेक्ट शुरु होने वाला हैं।जिसमें छात्रों को मुफ्त में शिक्षा के साथ रहने और खाने की भी व्यवस्था की जा रही हैं।जून में इसके लिए पूरे बिहार में प्रवेश परीक्षा का आयोजित होने वाला हैं।अभयानंद हमेशा कहते हैं बिहार ने मुझे बहुत कुछ दिया हैं जब तक इसके कर्ज को अदा नही कर देगे चैन से सांस नही लेगे।काश देश और विदेश में अपनी प्रतिभा के बल पर परचम लहङाने वाले हजारों बिहारी अभयानंद की तरह सोचते तो आज बिहार के मुख्यमंत्री को केन्द्र से भीख नही मांगनी पङती।

रविवार, मई 24, 2009

ममता,माया और जयललिता का राजनैतिक सफर

भारतीय राजनीत में ममता बनर्जी,मायावती और जयललिता किसी पहचान की मोहताज नही हैं।बिना किसी राजनैतिक क्षत्रंप के सहारे अपने बल पर राजनीत के क्षेत्र में इतिहास रचने वाले इन तीन देवियों ने बङे बङे सुरमाओ को दिन में तारे दिखा चुकी हैं।पिछले दो दशक से भारतीय राजनीत को अपने आस पास केन्द्रीत रखने वाले इन देवियों में इस वार ममता की बारी हैं जिन्होनें अपने बल पर वामपंथियों को उसी के गंढ में पटखनी दी हैं।ऐसे कयास लगाये जा रही हैं कि अगले विधानसभा चुनाव में वामपंथियों के अवैध दुर्ग पश्चिम बंगाल की किला ममता जरुर फतह कर लेगी।लेकिन ऐसा लगता हैं कि इस बार भी ममता उन्ही राजनैतिक गलतियों को फिर से दुहराह रही हैं जिसके कारण काफी लम्बी अवधी तक राजनीत की मुख्य धारा से दरकिनार रहना पङा था।यू कहे तो इन तीनों देवियों का हाल भारतीय हांकी टीम की जैसी हैं बहुत अच्छा खेलती लेकिन जब गोल करने की बारी आती हैं तो अंतिम समय में खुद गोल करने के चक्कर में या तो बोल गोलपोस्ट के उपर से चला जाता हैं या फिर विपक्षी टीम के रक्षंक खिलाङी छिनने में कामयाब हो जाते हैं।कहने का मतलव यह हैं कि जिस सोशल इंनजीनियरिंग के सहारे मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी।लेकिन एक ही वर्ष में उसकी धार कुंद हो गयी और लोकसभा के चुनाव में नुकसान उठाना पङा।राजनीत में व्यक्तिगत विद्वेश्य और अतिवादी कार्य शैली का कोई स्थान नही हैं लेकिन ये तीनों देवी इसके शिकार हैं,।जिसके कारण हर बङी जीत के बाद इन्हे फिर से शून्य से शुरु करनी पङती हैं।मायावती जिस अंदाज में उत्तरप्रदेश की गद्दी सम्भाली थी ऐसे कयास लगाये जाने लगा था कि आने वाले वर्षों में यह देश की प्रधानमंत्री बनेगी लेकिन अपनी गलती से ये भी सीख नही ली और सत्ता सम्भालते ही व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप में अपना समय जया करनी लगी परिणाम सामने हैं।मीडिया से लेकर करुणानिधी की कैम्प भी यह मान रहा था की इस बार तमिलनाडु में जयललिता की ढंका फिर बजेगी लेकिन हुआ इसके ठिक उलट इसके पीछे भी जयललिता की हठधर्मिता आङे आयी और तमिलनाडु के इतिहास के ठिक उलट परिवार वाद के सिंकजे में उलझ चुके करुणानिधि को लोगो ने अपार मतो से जीताया। ममता बन्रजी एक बार फिर काफी तामझाम के साथ सत्ता में आयी लेकिन ऐसा लग रहा हैं कि अपनी पुरानी गलती से सीख नही ली हैं। दिल्ली पहुचंते ही ममता वही पूरानी ममता दिखने लगी जिन्हे सम्भालने में वाजपेयी जी जैसे राजनेता को काफी मस्कत करनी पङी थी।रेल मंत्रालय की जिंद और पश्चिम बंगाल की सरकार को बरर्खास्त करने की मांग एक बार फिर से पूरानी ममता की याद ताजा कर दी हैं।हलाकि यह कहावत बिहार के गांव गांव में प्रचलित हैं लेकिन थोङा अभ्रश हैं लेकिन इन तीनों देवियों पर सटीक बैठती हैं कि कुत्ता को घी नही पचता हैं मतलब सत्ता इन्हे रास नही आती हैं।

शुक्रवार, मई 15, 2009

लोकतंत्र के नाम पर सब कुछ जायज हैं।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 15वी लोकसभा का चुनाव कई मायनों में यादगार रहेगा। आजादी के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव रहा जिसमें किसी भी राजनैतिक दल के पास कोई मुद्दा नही था।जब कि मंहगाई चरम पर हैं लेकिन किसी भी राजनैतिक दल ने इस मुद्दे को लेकर मनमोहन की सरकार को घेरने का प्रयास नही किया।वामपंथी जो चुनाव से पूर्व परमाणु डील के मुद्दे पर सरकार गिराने को आमदा थे चुनाव में इस मुद्दे को लेकर चर्चाये भी नही हुई।मुंबई में बिहारियों के पिटाई के मामले में जद यू के सांसद अपने पद से त्यागपत्र दे दिये थे लेकिन चुनाव में इस मसले को लेकर चर्चाये तक नही हुई।आये दिन लोगो की नौकरी जा रही हैं लेकिन यह किसी भी राजनैतिक दल के लिए कोई मुद्दा नही रहा कहने का यह मतलब हैं कि जनता के सरोकार से जुङे मुद्दे को लेकर कोई भी राजनैतिक दल चुनावी मैदान में नही आये थे ऐसे में मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग नही किया तो कौन सा गुनाह किया।वही इस चुनाव का दूसरा पहलु यह रहा कि चुनावी हिंसा में कही से भी किसी के हताहत होने की खबर नही आयी नक्सलीयों ने तबाही मचाने का प्रयास जरुर किया लेकिन कुछ खास कामयाबी उसे भी नही मिला।कहने का यह तातपर्य हैं कि राजनैतिक दल के गैर लोकतांत्रिक आचरण के बावजूद जनता ने मर्यादित होकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया लोकतंत्र के बेहतरी के लिए किया ।लेकिन चुनाव परिणाम के आहट के साथ ही जिस तरीके से दिल्ली के सिंहासन के लिए चौसर में दाव लग रहा हैं भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नही हैं।चुनाव खत्म होते ही राजनेता वह सब कुछ भूल गये जो कुछ चुनाव अभियान के दौरान जनता के सामने वादा किया था।बिहार के मुख्यमंत्री अपने ही गठबंधन के नेता नरेन्द्र मोदी को बिहार आने पर प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन चुनाव खत्म होते ही दोनो गले मिल रहे हैं। नीतीश कुमार पर भरोसा करने वाले अल्पसंख्यक मतदाताओं को आज क्या महसूस हो रहा होगा इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।यही स्थिति कांग्रेस का हैं जिन्होने बिहार की जनता से चुनाव के दौरान लालू को मदद करने को लेकर माफी मांगा था लेकिन चुनाव खत्म होंते ही आज एक दूसरे को गले लगा रहे हैं।लालू प्रसाद से अलग हुए अल्पसंख्यक मतदाता और नीतीश के सामंती कार्यशैली से क्षुब्द मतदाताओ का क्या हाल होगा जो कांग्रेस को खुलकर वोट दिया।भारतीय इतिहास में सत्ता के लिए सबसे बङा संग्राम महाभारत को माना जाता हैं जहां सत्ता पर काबिज रहने के लिए सभी तरह के मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया था।लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहां जनता की भागीदारी से सरकार बनती हैं इस दौङ में भी सत्ता के लिए इस तरह का खेल क्या जायज हैं।यह एक यक्ष सवाल हैं क्या यही लोकतंत्र हैं।

रविवार, मई 03, 2009

इतिहास नीतीश को दूसरे औरंगजेब के रुप में याद रखेगा

राजनैतिक विशलेषको और भाजपा जद यू के हल्ला बोल पार्टी और मीडिया के एक बङे तबके की माने तो नीतीश की आंधी पूरे सूबे में चल रही हैं।कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि बिहार में 1977वाली लहर चल रही हैं।परिणाम जो भी हो लेकिन इस बार के चुनाव में बिहार की जनता ने लालू और रामविलास पासवान के राजनैतिक कैरियर पर विराम लगाने का प्रयास अवश्य किया हैं।पिछले कई दशक से जातिये राजनीत के बल पर बिहार की जनता के दिल पर राज करने वाले इन दोनों नेताओं की यह शायद आखिर पारी न साबित हो। कहने का यह मतलब हैं कि बिहार में जातिये समीकरण पर चुनाव लङने की वर्षों पुरानी शैली का अंत होता दिख रहा हैं ऐसे में अब जातिये नारो पर बिहार में राज करना सम्भव होता नही दिख रहा हैं।जो भी हो बिहार वाकई बदल रहा हैं और अपने गौरवशाली इतिहास की और लौटने की प्रवृति बलवति होती दिख रही हैं।चुनाव के जो भी परिणाम हो लेकिन बिहार के लोगो ने नीतीश कुमार के तथाकथित सुशासन और विकास के दावे को भी लोगो ने सिरे ने नकार दिया हैं।1962के बाद बिहार में सबसे कम पोलिंग इसी चुनाव में हुआ है।लोगो ने काग्रेस को हाथों हाथ लिया जहां कांग्रेस का कोई नाम लेवा नही था वही आज सभी वर्गो के जुवान पर कांग्रेस का नाम हैं।लालू और रामविलास के हार का कारण भी कांग्रेस ही बनेगा।हो सकता हैं कि बिहार में कांग्रेस खाता भी नही खोल सके लेकिन एक बङी ताकत के रुप में जरुर उभर कर सामने आयेगा जो नीतीश और लालू राम विलास तीनों के लिए शुभ संकेत नही हैं।नीतीश कुमार फले ही ऐतिहासिक जीत दर्ज करे लेकिन बिहार की शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने के लिए इन्हे याद किया जायेगा।वही बिहार की राजनीत में जिस तरह से इन्होने मौका परस्ति और जातिये राजनीत के आङ में राजनीत का जो धिनौना खेल खेला हैं इतिहास औरंगजेब के बाद इन्हे शिद्दत से याद करेगा।जिस जार्ज ने लालू के अंहकार के खिलाफ बिहार में पार्टी खङी की और लालू प्रसाद को सत्ता से बेदखल किया उनके साथ नीतीश का व्यवहार शायद राजनीत का सबसे घिनौना चेहरा साबित होगा ।हो सकता हैं इस बार मुजफ्फरपुर में जार्ज की जमानत भी नही बचे लेकिन चुनाव अभियान के दौरान बिहार की जनता के सामने एक यक्ष सवाल जरुर खङा कर दिया हैं।क्या राजनीत में मौका परस्ति अनिवार्य हैं।जार्ज और दिग्विजय सिंह के साथ नीतीश कुमार को जो व्यवहार रहा शायद इस चुनाव का सबसे दुखद पहुली माना जायेगा।नीतीश भले ही ऐतिहासिक जीत दर्ज कर भारतीय राजनीत में एक नये क्षंत्रप के रुप में स्थापित हो जाये। लेकिन इनका यह मौका परस्ति इनके राजनैतिक सफर के अंत के लिए मील का पत्थर न कही शाबित हो जाये।

बुधवार, अप्रैल 15, 2009

प्रजातंत्र का यह कैसा महापर्व हैं।

15वीं लोकसभा चुनाव की उलटी गिनति शुरु हो गयी हैं।पहली बार चुनाव आयोग और कई स्वंयसेवी संगठनों ने मतदाताओं से मतदान में बढ चढ कर हिस्सा लेने के लिए अभियान चलाया हैं।लेकिन यह अभियान कितना सफल हो पाता हैं वह आने वाला वक्त ही बतायेगा।15वीं लोकसभा चुनाव के पूर्व आज तक देश में जितने भी चुनाव हुए हैं उसमें मतदान का प्रतिशत देखे तो कम से कम 48प्रतिशत और अधिक से 62प्रतिशत अपने मताधिकार का प्रयोग किया हैं।ऐलेक्सन वाच द्वारा तैयार आकंङों पर गौर करे तो शहरों में मतदान का प्रतिशत दिनों दिनों कम होता जा रहा हैं।झौपङ पट्टी के मतदाताओं का प्रतिशत हटा दे तो दिल्ली,मुबई,लखनुउ जैसे शहरों में बङे लोग और शिक्षित वर्ग के मतदाताओं के मतदान का प्रतिशत महज दस से बारह प्रतिशत हैं।मेरा खुद का अनुभव हैं 1998 लोकसभा चुनाव के दौरान मैं दिल्ली विश्वविधालय का छात्र था चुनाव में न तो हमारे शिक्षक मतदान करने गये थे और ना ही दिल्ली के रहने वाले हमारे साथ पढने वाले छात्र।शिक्षक औऱ छात्र चुनाव के दिन मतदान के लिए घोषित छुट्टी का उपयोग पार्क, रेस्टरा और कांलेज के लांन में मौज मस्ती में कर रहे थे।बिहारी होने के कारण नही चाहते हुए भी मतदान केन्द्र पर जाने की इक्छा को रोक नही सका मतदान केन्द्र पहुचा तो नजारा ही कुछ और ही था लम्बी लाईनो की बात करनी तो दूर बङे बुजुर्ग को छोङकर बूथ पर दूर दूर तक कोई नजर नही आ रहा था पार्टी द्वारा वाहन मुहैया कराने के बावजूद भी वोट डालने को लेकर लोगो में कोई खास उत्साह नही दिख रहा था यह नजारा किंग्वेकैम्प इलाका का था।हाई प्रोफाईल माने जाने वाले बंसत कुंज मालवीय नगर,जवाहर लाल नेहूरु विश्वविधालय के आस पास स्थित मतदान केन्द्रो का हाल तो और भी बुरा था दुर दुर तक वोटर दिखायी दी दे रहे थे।उसके उलट नंदनगरी जिसे हमलोग गंधनगरी कहते थे उन इलाकों में वोटरो की लम्बी कतारे देखी जा रही थी।इस बार दिल्ली और कर्नाटक में विधान सभा का चुनाव हुआ तो मैं अपने पुराने मित्रों से मतदाताओं का ट्रन्ड जानना चाहा तो कमों वेस यही स्थिति आज भी हैं।चुनाव के दिन अधिकांश प्राईवेट कम्पीनयों के दफ्तर में आम दिनों की तरह ही चलह पहल देखी जा रही हैं।लाखो रुपये का पैकेज पाने वाले हमारे कई सोफ्टवेयर इनजीनियर और पत्रकार मित्रों से चुनाव के दिन बात किया तो वोट देने की बात करना उन्हे अच्छा नही लगा।मेरे कहने का आसय यह हैं कि जिनके सहारे हम विश्व के सबसे बङे लोकतंत्र होने का दावा कर रहे हैं उनके लिए हमारी सरकार आज तक क्या की हैं।दिल्ली में एक घंटे बिजली कट जाये तो मीडिया के लिए सबसे बङी खबङ बन जाती हैं।सरकार को जबाव देनी पङती हैं लेकिन भारत में आज भी दो लाख से अधिक गांव हैं जहां आज तक बिजली का खम्भा भी नही पहुचा हैं।सरकार की आकङों पर ही गौर करे तो देश की 35करोङ आबादी निरक्षर हैं,31.8करोङ लोगो को स्वच्छ पानी से वचित हैं।वही देश की 25करोङ आवादी को स्वास्थय सुविधा उपल्बध नही हैं।85करोङ आवादी की रोज की आमदानी बीस रुपया से कम हैं। लेकिन आज दो वक्त की रोटी और समान्य सुविधा से भी महरुम देश की 65 प्रतिशत आबादी लोकतंत्र के इस महा पर्व में भाग लेने के लिए पंजाब और दिल्ली से वापस गांव लौट रहे हैं।गांव के ग्रामीण जनता की लोकतत्र के प्रति सब कुछ लुटा देने के बावजूद जो आस्था आज भी बरकरार हैं उनसे खेलवाङ न करे नही तो आने वाल कल वाकय भयावह होगा।आप आपना बजूद ढूढते रह जायेगे कब तक देश की भोली भाली जनता के मेहनत की कमाई के बल पर महानगरों की सुदरता बढाते रहेगे।जरा सोचिए नही तो भारतीय लोकतंत्र का क्षय निश्चित हैं।आज देख लिजिए माओवादियों के वोट बहिष्कार के घोषणा का असर सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों से पांच सौ मतदान केन्द्रों को हटा लिया हैं और दो सौ से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में नकस्लीयों के सम्भावित हमलो को देखते हुए मतदान की समय कम कर दी गयी हैं।यह प्रवृति बढ रही है और इसी तरह हमारी अर्थ नीति चलती रही तो एक दिन ऐसा भी आ सकता हैं की सरकार ई0भी0एम0 लेकर घुमती रहेगी कोई वोट देने वाला नही मिलेगा।

रविवार, मार्च 29, 2009

इस बाजार में मेरी अस्मत की बोली लगी हैं

दोस्त आज मेरी अस्मत की बोली लगायी जा रही हैं मौका मिले तो आप भी इस बोली में शामिल हो जाये।मेरी कमित मात्र पचास रुपया पर सेन्टी मीटर पर एसक्वायर है,अगर रंगीन मिजाज जैसी कोई बात हो तो मात्र वासठ रुपया पर सेन्टीमीटर पर एसक्वायर में बिकने को तैयार हैं,इससे भी मन नही भरा तो आधे घंटे का सीधा प्रसारण कराले किमत मात्र पांच से दस लाख रुपये अदा करनी होगी।शायद अब आप भी कुछ कुछ समझने लगे होगे।इस बार के लोकसभा चुनाव के दौरान भारत का नम्बर वन होने का दावा करने वाले अखबार के सम्पादक जिला जिला जाकर अपने संवाददाताओं को जिस्म बेचने की तरकीब बता रहे हैं।यही स्थिति चैनेल चलाने वाले हुकंमरानों का हैं पैसा मिला तो सरकार की अच्छाई दिखाने में लगा हैं पैसा नही मिला तो खिसिंयानी बिल्ली खम्भा नोचे वाली स्थिति बना ली हैं।कहने का मतलब यह हैं कि आज जिसके पास पैसा हैं कुछ भी अपने बारे में लिखवा सकता हैं या फिर कुछ भी अपने बारे में दिखवा सकता हैं।अखवार या फिर चैंनल वाले सरकार या फिर नेताओं की बाते विज्ञापन के माध्यम से दिखाते थे और जनता को भी स्पष्ट तौर बताया जाता था कि यह विज्ञापण हैं लेकिन इस बार से ऐसा नही होगा।बङे से बङे पत्रकार जिनके लेखनी को पढने के लिए सुबह होने का लोक इन्तजार करते हैं उनकी लेखनी भी अब पैसे पर खरीदी जायेगी कहने का मतलब यह हैं कि आप चुनाव लङ रहे हैं और आपके पास पैसा हैं तो आप चुनाव में जो चाहे समाचार के रुप में छपवा सकते हैं।चुनावी समीक्षा भी सबसे अधिक बोली लगाने वाले उम्मीदवार के इक्छा के अनुसार छापा जायेगा और उसके इक्छा के अनुसार दिखाया भी जायेगा।अब आप ही बताये जिस देश में अखवार और चैनल में छपने और दिखाने वाली बातो को जनता सच का आईना मानती हो और इस प्रोफेसन से जुड़े लोगो को समाज सम्मान की दृष्टी से देखता हो ।साथ ही संविधान जिसे देश के चौथे स्तम्भ का दर्जा दिया हो उनसे ऐसे हलात में इस तरह का धोखा क्या जायज हैं ।यह सवाल मात्र नही हैं देश की जनता के भरोसा के साथ दगा देने की बात हैं। क्या बाजार वाद के इस दौड में इसी तरह अपने जिस्म दिल और आत्मा को बेचते रहेगे शायद इससे बेहतर तो चकला घर चलाने वाली कविता,सरिता जैसे लाखों लङकिया हैं जो किसी न किसी मजबूरी में अपना जिस्म बेचकर दो वक्त की रोटी खरीद रही हैं।कलम के सौदागार अपने कलम को गिरवी रखने से बेहतर हैं अपने कौशल का उपयोग करे अभिव्यक्ति के और भी साधन इस देश में उपल्बध हैं।इस शहर में एक बार वैश्या होने को मोहर लग गया तो दामन में लगे दाग को मिटाने में कई दशक लग जायेगा

गुरुवार, मार्च 26, 2009

जातिगत राजनीत को जिंदा रखना चाहते हैं राजनीतिज्ञ

लालू प्रसाद की सत्ता को उखाङ फैकने के लिए नीतीश कुमार ने बिहार में बिकास को चुनावी मुद्दा बनाया था और पहली बार बिहार में जातिये गोलबंदी के बजाय आम मतदाताओं ने विकास के आधार पर वोट दिया।सत्ता सम्भालते ही नीतीश कुमार विकास और सुशासन को अपना मुख्य ऐजंडा बनाया और इस पर अमल हो इसके लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय भी लिये।देखते देखते बिहार में सङको का हाल बदलने लगा वर्षो से मृत प्राय सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढने लगी जनता निजी अस्पतालो से मुख मोङने लगे।वर्षो से जिस सङकों पर गाङी चलनी बंद थी उन सङकों पर कार दौङने लगी।बङे बङे फ्लाई ओभर बनने लगे शहरों की सुन्दरता बढने लगी,कानून व्यवस्था में काफी सुधार हुआ राजधानी पटना में जहां शाम के सात बजते बजते दुकाने बंद होने लगती थी अब स्थिति यह हैं कि राजधानीवासी रात के 11 बजे तक शहर में बैखोफ घुमते हैं।इस बदलाव का असर व्यवसाय पर भी देखने को मिला आधुनिक संस्कृति की दुकाने और रेस्टोरेन्ट देखते देखते पूरे बिहार में फैल गया।तीन वर्ष वाद सरकार ही नही वर्षो बाद बिहार आने वाले बिहारी भी बिहार में हो रहे बदलाव की तारीफ करने से नही थकते।लेकिन चुनाव का बिगुल फूकते ही सारा समीकरण बदलने लगा हैं।नीतीश कुमार जो कल तक विकास के नाम पर वोट मांगने की बात कर रहे थे आज सोशल इंजीनियरिंग के सहारे चुनाव जीतने के लिए वो सारे तिकरम कर रहे हैं जिसके सहारे लालू प्रसाद 15 वर्षों तक बिहार में राज्य किया।प्रतिभा की दुहायी लगाने वाले नीतीश कुमार जात और जमात के नाम पर अपराधियों से लेकर दलबदलुओं तक को अपनी पार्टी से टिकट देने से परहेज नही किये और स्थिति यह हैं कि पूरे बिहार में एक बार फिर जातिये गोलबंदी तेज हो गयी।प्रारम्भिक तोङ पर इस मामले को लेकर जनता का नब्ज टटोलने का प्रयास किया तो काफी सकारात्मक परिणाम देखने को मिला हैं।जिस नीतीश कुमार ने सोशल इंजीनयरिंग के नाम पर बिहार के सर्वणों को राजनीत के मुख्य धारा से अलग करने का प्रयास किया हैं वो तवका आज भी विकास के नाम पर नीतीश के खिलाफ आक्रमंक वोटिंग से परहेज करते दिख रहे हैं।काराकाट लोकसभा क्षेत्र जहां राजपूतो का अच्छा खासा वोट हैं और कई बार यहां से राजपूत सांसद रहे हैं।लेकिन नीतीश कुमार ने सोशल इंनजीनियरिंग के तहत कोयरी जाति के महाबली सिंह को टिकट दिया हैं जो एक सप्ताह पूर्व तक राजद (लालू) के पार्टी का विधायक था।इस क्षेत्र के दर्जनों राजपूत मतदाताओ से बात की तो सभी ने विकास की बात दोहराते हुए नीतीश कुमार को वोट देने की बात कर रहे हैं लेकिन यह भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार भी जातिये गोलबंदी को तहजीह दिये तो परिणाम उलट भी हो सकता हैं फिर भी राजपूत मतदाता नीतीश के प्रत्याशी के खिलाफ आक्रमंक वोटिंग नही करेगा।यही स्थिति दरंभंगा,मधुवनी,सहरसा के ब्रह्णण वोटरो का हैं। गौर करने वाली बात यह हैं कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीत में राजपूत और ब्रह्णाण को पूरी तौर पर दर किनार कर दिया हैं। लालू प्रसाद समाजिक न्याय के आंधी में भी इन जातियों के दरकिनार करने का साहस नही उठा पाया थे। फिर भी इस जाति के वोटर बिहार के विकास के नाम पर नीतीश कुमार के खिलाफ जातिये गोलबंदी से आज तक परहेज कर रहे हैं।लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह से राजनेता जातिये भवनाओ को भङका कर लोगो को गोलबंद करने में कामयाब हो जाती हैं तो इस स्थिति में नीतीश कुमार की पार्टी को बङा नुकसान झेलना पङ सकता हैं।ऐसे हालात में यह कहना की विकास के नाम पर वोट नही होता सच के कोसो दूर होगा।यू कहे तो एक बार फिर नीतीश कुमार ने ही जातिय समीकरण,के नाम पर राजनीत की एक नयी शैली की शुरुआत की हैं जो चुनाव से पूर्व ही लोगो को आहत कर दिया हैं।ऐसे स्थिति में बिहार में वोटो का प्रतिशत काफी कम हो जाये तो अतिशियोक्ति नही होगी।जातिवादी राजनीत की नयी धारये जो जन्म देने के लिए नीतीश की जय हो।